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कुछ बनना ही है तो प्रशंसात्मक बने, आलोचनात्मक नहीं

प्रशंसा करे, आलोचना नहीं


ना जाने कितनी बार ऐसा हुआ होगा की जाने अनजाने में आपने लोगो की शक्ल सूरत और उनके कपड़ो के आघार पर उनका पूरा जीवनवृत्तांत बता दिया होगा। ना जान न पहचान, पर एक नज़र में उनके बारे में सब जान लिया होगा। और उनकी आलोचना भी कर ली होगी। ‘अरे ये तो बिगड़ा हुआ होगा’, ‘लड़की के लक्षण थोड़े ठीक नहीं है, ज़रूर कुछ लफड़ा है’, ‘लड़की देर रात बाहर कैसे? पता नहीं क्या काम करती है?’, ‘लड़का फ़ैल हुआ था, ज़रूरी बुरी संगती में रहा होगा।‘

अब जितने मुंह, उतनी बातें। और जितनी आँखे, उतने नज़रिए। लोगो को एक नज़र देख के उनके चरित्र और हरकतों के बारे में तो लोग इतनी आसानी से बताते है, जैसे वो उन्ही के परिवार का हिस्सा हो और जान पहचान बहुत पुरानी हो। अरे मेमसाहब और भाईसाहब, ज़रा पीछे मुड़ के देखें आपका घर परिवार, आपकी प्रतीक्षा कर रहा है। लोगों से नज़र हटाइये और अपने गिरेबान में झांकिए।

हम हर किसी की आलोचना कर सकते है। लड़की के कपडे देख कर उसके चरित्र के बारे में बात करते है। लड़के की शक्ल देख कर, उसकी आदतो के बारे में पूरी समीक्षा कर लेते है। लोगो की गाड़ी देख कर, उनकी आर्थिक स्तिथि के बारे में बता देते है। और उनकी हार देख कर, उनकी ग़लतियो का पूरा उल्लेख भी कर लेते है। एक काम के आधार पर हम लोगो की काबिलियत का निर्णय ले लेते है। और किसी के बात करने के ढंग से उन में तहज़ीब की कमी के बारे में बता देते है।

कमी, खराबी या गलती उनके काम या कपड़ो में नहीं होती। दिक्कत है, आपकी छोटी सोच में, जो कभी सुधर नहीं सकती। दिक्कत है, आपके आलोचनात्मक होने पर। दिक्कत है, आपके हर सिक्के के दूसरे पहलु को अनदेखा करने की आदत में। दिक्कत है, आपके नज़रिए में। दिक्कत है, आपकी पमानसिकता में। दिक्कत है, प्रशंसा करने पर शर्मिंदा और चूर होने वाले आपके अहँकार में।

आपकी भी हो सकती है आलोचना

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किसी को जज करना या उनकी आलोचना करना हमारा मकसद नही होता। अक्सर हम उन्हें अनजाने में जज कर बैठते है। हमे पता भी नही लगता और हम लोगो के बारे में एक चित्र अपने दिमाग में बना लेते है। लोगों की आलोचना हम चार कारणों की वजह से करते है :-

  • हम खुद से नाखुश होते है।

हम अक्सर खुद को पसंद नहीं करते। और ये एक बहुत बड़ा और ख़ास वजह है लोगो को जज या उनकी आलोचना करने के लिए। हम खुद से संतुष्ट नहीं होते। इसलिए हम दूसरों को नीचे खीचते है, ये सोच के ही हम उनसे ऊपर आ जाएंगे।

  • हम डरते है।

हम इस बात से डरते है कि दूसरा व्यक्ति हम से बेहतर न हो। और अगर वो हम से बेहतर होता है तो हम उसका मज़ाक उदा कर, उसकी आलोचना कर हम उसको नीचा दिखाते है। हमे लगता है कि शायद ये कर के हम उनसे बेहतर हो जाएंगे, पर ऐसा होता नहीं है।

  • हम अकेले होते है।

अक्सर जब हम अकेला महसूस करते है या सच में अकेले होते है तब हम लोगो से दोस्ती करने के लिए, उनके साथ दूसरे लोगो की आलोचना करते है। पर ये दोस्ती ऐसी होती है, जो ज़्यादा समय तक नहीं चल पाती।

  • हमे बदलाव चाहिए होता है।

खुद की जिंदगी से नाखुश, हम दूसरो की खुश ज़िंदगी को नही देख पाते। हमे अपनी ज़िंदगी बदलनी होती है, जो हम नहीं बदल पाते और इस वजह से उनकी बदलती ज़िन्दगी की आलोचना करते फिरते है।

किसी की प्रशंसा करना मुश्किल नहीं है। अगर आप उनकी खामियां और बुरी चीज़े देख सकते है तो आप उनकी खूबियां और अच्छी बातें भी देख सकते है। उन से ईर्ष्या या उनकी आलोचना करने से बेहतर है कि आप उनकी खूबियों से सीखे। हर व्यक्ति की अच्छाइयों और बुराइयों से सीखा जाए तो हम खुद एक बहुत बेहतर इंसान बनेंगे। और दूसरों की प्रशंसा और आलोचना करने के पहले आप खुद को ज़रूर देखे।

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