Categories
वीमेन टॉक

जानें कर्नाटक की उस मसाला फैक्ट्री के बारे में जहां केवल महिलाओं को मिलता है रोजगार

Only women get employment in this spice factory

इस मसाला फैक्ट्री में सिर्फ महिलाओं को ही मिलता है रोजगार


जैसा कि हम सभी लोग जानते है कि एक समय था जब महिलाओं को घर की चार दीवारी से बाहर जाने की अनुमति नहीं थी लेकिन आज समय काफी हद तक बदल गया है। और आज के समय में महिलएं अपने पैरों पर खड़ी है। वो आज के समय में पूरी तरह आत्मनिर्भर है महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में कई लोगों ने अपना योगदान दिया है आज हम आपको एक ऐसी ही मसाला फैक्ट्री के बारे में बताने जा रहे है जहां सिर्फ महिलाओं को रोजगार मिलता है ताकि महिलाओं की स्थिति सुधर सके। तो चलिए विस्तार से जानते है इस मसाला फैक्ट्री के बारे में।


कहां है ये मसाला फैक्ट्री

ये मसाला फैक्ट्री कर्नाटक के चित्रदुर्ग जिले में स्थित है। यह एक ऐसी मसाला बनाने वाली कंपनी है जिसमें सिर्फ महिलाओं को ही रोजगार मिलता है। 1979 में महिलाओं की स्थिति को देखते हुए लक्क्षम्मा और थिप्पीस्वामी ने इस मसाला बनाने वाली फैक्ट्री की शुरू की थी। आपको जान कर थोड़ी हैरानी होगी की इस मसाला फैक्ट्री की शुरुआत महज 20 हजार रुपये से की गयी थी। इस मसाला फैक्ट्री को शुरू करने का मुख्य उद्देश्य बिजनेस को बढ़ाकर महिलाओं की मदद करना था। इतना ही नहीं इस मसाला फैक्ट्री में कई महिलाओं को काम करते हुए 30 साल से भी ज्यादा समय हो चुका
है।

और पढ़ें: जानें कौन है मनदीप कौर, जो न्यूजीलैंड में बनी पहली भारतीय मूल की पुलिस सर्जेन्ट

जानें क्या मानना है मसाला फैक्ट्री के मालिक का

इस मसाला फैक्ट्री के मालिक का कहना है कि महिलाएं अपने जीवन में बहुत सारे संघर्ष करती हैं। उसके बाद भी उनको कई बार इसका फल नहीं मिल पाता। इसलिए उन्होंने यह निर्णय लिया कि वो सिर्फ महिलाओं को ही अपने वहां काम पर रखेंगे। जिसके बाद उन्होंने पाया कि महिलाएं एक वर्कर के रूप में काफी अच्छी काम कर रहती है। साथ ही साथ उनकी स्किल पुरुषों से ज्यादा अच्छे होते हैं। इतना ही नहीं महिलाएं सामान भी काफी कम बर्बाद करती हैं और सभी चीजों को काफी अच्छी तरह संचालित करती है।

अगर आपके पास भी हैं कुछ नई स्टोरीज या विचार, तो आप हमें इस ई-मेल पर भेज सकते हैं info@oneworldnews.com

Categories
हॉट टॉपिक्स

जाने पाँच दोस्तों ने कैसे कैसे मिल कर शुरू किया मसालों का बिजनेस, जिससे आज आदिवासी परिवारों को मिल रही है नई उम्मीद

जाने पाँच दोस्तों की गाँव के हर घर को रोज़गार देने की कोशिश


कोरोना वायरस के कारण हुए लॉकडाउन ने बहुत सारे लोगों की ज़िन्दगी बदल कर रख दी है. कोरोना वायरस के कारण बहुत सारे लोगों ने साल 2020 में काफी कुछ खो दिया है. बीता हुआ पिछले साल किसी के लिए भी कुछ खास नहीं रहा.  लॉकडाउन के दौरान अपने घरों को लौट रहे प्रवासी मज़दूरों के दर्द को पूरे देश ने महसूस किया था.  कोरोना वायरस लॉकडाउन के कारण अपने घरों को लौट रहे सड़क पर भूख-प्यास के कारण कई प्रवासी मज़दूरों ने अपनी जानें भी गंवाई है. कोरोना वायरस लॉकडाउन वास्तव में एक ऐसा मार्मिक दृश्य था, जिसे कोई चाहकर भी नहीं भूल सकता. लेकिन आज हम आपको बीते हुए बुरे दिन याद नहीं दिला रहे है बल्कि आपको पाँच ऐसे दोस्तों की कहानी बताने जा रहे हैं, जिन्होंने अपनी सोच और प्रयासों द्वारा एक ऐसी पहल की, जिसे सभी लोगों को उस मुसीबत के समय पर भी नई किरण दिखाई देती थी.

 

 

और पढ़ें:  62 साल की शीला बुआ के हौसले को सलाम, इस उम्र में भी घर-घर जाकर साईकिल से बेचती है दूध

 

 

जाने पाँच दोस्तों की कहानी

 

आज हम आपको उन पाँच दोस्तों की कहानी बनाते जा रहे है जिन्होंने लॉकडाउन के दौरान बुरे समय में भी लोगों के लिए  एक नई किरण का काम किया. दरअसल यह कहानी मूल रूप से बिहार के छपरा में रहने वाले अरुण और उनके मध्य प्रदेश  में  रहने वाले अन्य चार साथियों की है. जिन्होंने कोरोना वायरस लॉकडाउन के दौरान घर लौट रहे प्रवासी मज़दूरों तथा उनके परिवार का दर्द समझा और उनकी मदद के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया. अरुण को एक आईडिया आया जिसे उन्होंने अपने दोस्तों नवदीप सक्सेना, अभिषेक विश्वकर्मा, राहुल साहू, और अभिषेक भारद्वाज के साथ शेयर किया. अरुण के सभी दोस्त  उनके इस आईडिया में उनके साथ थे.  इससे उन लोगों को अच्छी कमाई का मौका मिलने के
साथ ही साथ प्रवासी मज़दूरों के परिवारों को भी लाभ मिले.

 

जाने मसालों का बिजनेस ही क्यों?

नवदीप सक्सेना भोपाल स्थित आदर्श हॉस्पिटल में आर.एम.ओ. के रूप में काम कर चुके. नवदीप बताते हैं कि मध्य प्रदेश को मसालों का गढ़ माना जाता है. फिर चाहे वह निमाड़ की मिर्च हो या कुंभराज का धनिया. यहाँ पूरे देश के मुताबिक सबसे ज्यादा मसालों का उत्पादन किया जाता है.  मध्य प्रदेश से मसालों की सफ्लाई पूरे देश में की जाती है. नवदीप सक्सेना कहते है कि हम लोग कुछ ऐसा करना चाहते है जिससे किसानों की भी थोड़ी मदद हो सके. फिर वो कहते है कि हम कच्चे मसालों को मंडी से खरीदते हैं फिर उनको साफ़ करवा कर पिसाई के लिए दे देते है. जिसके बाद इनकी पैकेजिंग हमारे यूनिट में की जाती है.  अरुण बताते है कि शुरुआती दिनों में हमारे साथ पाँच महिलाएं काम करती थीं. लेकिन, आज हमारे साथ 30 महिलाएं काम करते हैं.

 

अगर आपके पास भी हैं कुछ नई स्टोरीज या विचार, तो आप हमें इस ई-मेल पर भेज सकते हैं info@oneworldnews.com

Categories
काम की बात करोना

जातीय समीकरण से ऊपर उठता बिहार का चुनाव, क्या रोजगार के नाम पर महागठबंधन को ताज दे पाएगा

10 लाख नौकरियों ने बदला बिहार चुनाव का रुख


बिहार चुनाव में एक महीने पहले तक रोजगार नाम की चीज का कोई हो हल्ला नहीं था. लेकिन अचानक से महागठबंधन के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार तेजस्वी यादव द्वारा रोजगार की बात करने के बाद बिहार चुनाव की हवा ही पूरी तरह से बदल गई. जिसके बाद एनडीए ने 19 लाख नौकरियां देने का ऐलान किया. जिसने बेरोजगार युवाओं का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया. आज काम की बात में हम इसी मुद्दे पर चर्चा करेगे.

बिहार चुनाव में सीट बंटवारे तक सिर्फ जातीय समीकरण ही दिख रहा था. काम की बात में हमने आपको बताया था कि बिहार में जातीय समीकरण के आधार पर कैसे सीटें बांटी गई है. क्योंकि ऐसा माना जाता है कि बिहार में वोट हमेशा जाति के आधार पर ही दिया जाता है. लेकिन अचानक तेजस्वी द्वारा 10 लाख सरकारी देने के वायदे ने पूरे चुनाव का ही रुख बदल दिया. जिसने लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया. लोगों को अब वायदे नहीं रोजगार चाहिए. कोरोना के  बाद से लोगों के पास रोजगार नहीं हैं. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने एक भाषण में बताया था कि लॉकडाउन के दौरान बिहार में करीब 22 लाख प्रवासी मजदूर अपने क्षेत्र वापस आएं थे. इनमें से ज्यादातर लोगों का रोजगार चला गया था.

तेजस्वी का इंटरव्यूय

तेजस्वी ने सिर्फ 10 लाख नौकरी देने का वायदा नहीं बल्कि इसकी व्याख्या भी की है वो कैसे अपने वायदे को पूरा करेंगे.  कैसे वह हर बिहारी युवाओं के हाथ रोजगार देगें. जी हिंदुस्तान को दिए गए एक इंटरव्यू में तेजस्वी ने बताया कि साढ़े चार लाख नौकरी के पद खाली है.  शिक्षा विभाग में शिक्षक नहीं है, पुलिस विभाग में,  स्वास्थ्य विभाग में डॉक्टर और नर्सेस नहीं है, इनके के साथ सपोर्टिंग स्टॉफ भी जरुरत पड़ती है. यह सब मिलकर साढ़े चार लाख नौकरियां है, बाकी साढे पांच लाख नौकरियां सभी तबके के लोगों के लिए है. इन सबको मिलाकर लगभग 10 लाख नौकरियां बिहार में हैं. जिसे बिहार सरकार जब चाहे एक हस्ताक्षर द्वारा ला सकती है. तेजस्वी का कहना है कि इन सब  पर उन्होंने कई अर्थशास्त्रियों से बातचीत की है उसके बाद ही इस पर टिप्पणी की है.  इतना ही नहीं तेजस्वी अपनी हर सभा में यह कहते हुए नजर आएं है कि सरकार, सरकारी बजट का 80 प्रतिशत खर्च ही नहीं कर पाती है.

और पढ़ें: क्या चिराग पासवान का बदला तेवर बिहार चुनाव में कोई कमाल कर पायेगा

विपक्ष की प्रतिक्रिया

तेजस्वी की 10 लाख नौकरी पर प्रतिक्रिया देते हुए बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी का कहना है कि 10 लाख नौकरियों को समायोजित करने के लिए लगभग 58,000 करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी जोकि वार्षिक बजट से ऊपर है. उन्होंने कहा कि 22,270.09 करोड़ रुपये  के लिए 1.25 लाख डॉक्टरों, 2.5 लाख पैरा मेडिकल स्टाफ की आवश्यकता होगी. 95,000 पुलिस अधिकारियों की भर्ती के लिए 3,604 करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी और इंजीनियरों की भर्ती पर 6,406 करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी. यह सब 58,415 करोड़ रुपये में जुड़ता है.

उन्होंने विपक्ष पर हमला करते हुए कहा है कि यदि  वेतन पर इतना खर्च किया जाएगा तो, वे छात्र की छात्रवृत्ति, वर्दी, साइकिल, मध्यान्ह भोजन, पेंशन और बिजली पर खर्च की आवश्यकता को कैसे पूरा करेंगे?

बीजेपी की 19 लाख नौकरियां

बिहार भाजपा अध्यक्ष डॉ संजय जायसवाल ने कहा कि इन 19 लाख नौकरियों में से केवल 4 लाख सरकारी क्षेत्र में हैं. जिसमें से शिक्षा क्षेत्र में 1 लाख और स्वास्थ्य में 1 लाख है. जबकि आईटी सेक्टर 1 लाख नौकरियों में योगदान देगा और बाकी रोजगार कृषि क्षेत्र में है.  चुनाव के दौरान एनडीए यह  दावा कर रही है कि 15 साल के कार्यकाल में उन्होंने बिहार की जनता को 6 लाख नौकरियां दी हैं.  केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने दावा किया है कि बिहार के प्रत्येक गाँव में ऑप्टिकल फाइबर के बिछाने से केंद्र के आईटी विभाग के तहत स्थानीय स्तर पर और सीएससी (कॉमन सर्विस सेंटर) स्थापित करने के लिए नौकरियां पैदा हुई हैं.  इन सभी ने बिहार में पुरुषों और महिलाओं के लिए 2.5 लाख नौकरियां पैदा की. जनता दल-युनाइटेड ने तेजस्वी के दावे का विरोध करते हुए कहा कि केवल 1 लाख नौकरियां खाली हैं (4.5 लाख नौकरियां नहीं).  इन 1 लाख नौकरियों में से 75,000 का विज्ञापन निकाला जा चुका है.  नीतीश कुमार भी भाषणों के दौरान दावा करते हुए दिखाई देते हैं कि बिहार में राजद के 15 साल के शासन में केवल 95 लाख नौकरियां पैदा हुईं, जबकि नीतीश के 15 साल के शासन में 6 लाख नौकरियां दी है.

और सम्बंधित लेख पढ़ने के लिए वेबसाइट पर जाएं www.hindi.oneworldnews.com

सीएमआई की रिपोर्ट

कोरोना के बाद लगभग हर राज्य की अर्थव्यवस्था गिर गई है. लेकिन बिहार में आएं 22 लाख प्रवासी मजदूरों ने बेरोजगारी दर को और बढ़ा दिया है. रिपोर्ट की बात करें तो सीएमआई  की रिपोर्ट के अनुसार जनवरी से अप्रैल 2020 तक बिहार का हर दूसरा युवा बेरोजगार है. पीएलएफएस की रिपोर्ट के अनुसार 86.9% लोगों को पास रोज रोजगार नहीं होता है.  एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार 2015 से 2019 तक नौकरी न होने के कारण आत्महत्या में 438% की वृद्धि हुई है.

हाल ही की बात करें तो सिर्फ सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे युवा ही बेरोजगारी नहीं है. ब्लकि प्राइवेट जॉब करने वालों का भी हाल बुरा हैं. सीआईएमई की रिपोर्ट के अनुसार लॉकडाउन के दौरान अप्रैल और मई में बेरोजगारी 46% तक पहुंच गई है. जो बाकी सभी राज्यों से सबसे ज्यादा बुरी स्थिति में है. इस वक्त बिहार में बेरोजगारी दर सामान्य से 6.7% तक बढ़ गई थी.

साल 2004-05 की बेरोजगारी दर मात्र 0.8 थी. लेकिन बेरोजगारी दर में वृद्धि साल दर साल बढ़ती गई. साल 2011-12 में 1.6, 2017-18 में 1.2, और 2018-19 में 1.8 हो गई

इस बारे में हमने  बीएचआर न्यूज बिहार के संपादक अनुपम कुमार से बात की तो उन्होंने बताया विधानसभा चुनाव में रोजगार सबसे बड़ा मुद्दा बन गया है. बिजली, शिक्षा, भ्रष्टाचार जैसे मामले पीछे छूट गये हैं.  राजद नेता तेजस्वी यादव ने सबसे पहले इस मामले को उठाया. श्री यादव ने अपने हर चुनावी सभा में कहा कि राज्य के युवाओं के पास रोजगार की कमी है. वर्तमान राज्य और केन्द्र सरकार इस मामले पर कोई कार्रवाई नहीं कर रही है. रोजगार हर काल और परिस्थिति में बना रहा है, लेकिन यह चुनावी मुद्दा बन जाये यह पहली बार हुआ है. बिहार के युवाओं ने भी माना है कि रोजगार सबसे पहली आवश्यकता है. जिससे अन्य दलों ने भी तरजीह दी और अपने चुनावी सभाओं में इसे कहना शुरू कर दिया. रोजगार के मुद्दे पर बिहार की राजनीतिक हवा बदल सकती है और एक बड़ा उलट-फेर होने की सम्भावना भी बनती दिख रही है.

आने वाली 10 नवंबर को अब देखना है रोजगार का मुद्दा किसे राजगद्दी पर बैठाता है. बिहार चुनाव में पहली बार जाति समीकरण के ऊपर उठकर रोजगार के मुद्दों का तवज्जो दिया गया है. युवा नेता का यह जोश और वायदा देखते हैं बिहार के युवाओं का भविष्य संवार सकता है कि नहीं?

अगर आपके पास भी हैं कुछ नई स्टोरीज या विचार, तो आप हमें इस ई-मेल पर भेज सकते हैं info@oneworldnews.com

Categories
काम की बात करोना

बिहार चुनाव से मुद्दे हैं गायब, बस जाति वोट पर ही टिका है सारा समीकरण

अब लोग विकास चाहते हैं


बिहार में आगामी चुनाव का आगाज हो चुका है. चुनाव तीन चरणों में होगें. इसके साथ ही पहले चरण का चुनाव 28 अक्टूबर को होना है. जबकि दूसरा 3 नवंबर और तीसरा 7 नवंबर को होगा. जिसका नतीजा 10 नवंबर को आना है.

पार्टियों की सियासत

बिहार चुनाव से पहले ही यहां की मुख्य पार्टियों की आपसी टकरार शुरु हो गई थी. महागठबंधन और एनडीए के साथी सदस्यों में सीटों को लेकर आपसी तनातनी हुई. जिसके बाद एनडीए की सबसे बड़ी पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी ने गठबंधन से अलग होना का फैसला किया. लोजपा प्रमुख चिराग पासवान ने सभी 243 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने का फैसला किया और इस तरह से बिहार विधानसभा चुनाव में लोजपा, एनडीए से अलग होकर लड़ रही है. अब देखना यह है कि इस तरह का फैसला लोजपा को कितनी दूरी तक ले जाता है. वहीं दूसरी ओर महागठबंधन की साथी पार्टी विकासशील इंसान पार्टी(वीआईपी) ने भी सीटों के बंटवारों को लेकर महागठबंधन  का साथ छोड़कर एनडीए का दामन थाम लिया. पार्टियों और सीटों के हेर फेर में अब देखने वाली  बात यह है कि बिहार की गद्दी किसकी झोली में जाती है. 

जाति का समीकरण

बिहार की राजनीति विकास से ज्यादा जाति की नींव पर टिकी हुई है. टिकटों का बंटवारा भी हर बार की तरह इस बार भी जाति के आधार पर ही किया गया है. पार्टियां भले ही अलग-अलग है लेकिन दोनों के उम्मीदवार एक ही जाति के है. दैनिक भास्कर पटना संस्करण की खबर के अनुसार 76 प्रतिशत सीटों पर एक ही जाति के प्रत्याशी चुनावी अखाड़े में उतरे हैं. राष्ट्रीय लोक समता  पार्टी की 17 सीटों पर कुशवाहा लड़ेंगे. बेहलर विधानसभा में राजग, महागठबंधन, बसपा और लोजपा सभी के उम्मीदवार यादव हैं. वहीं दूसरी ओर बाढ़ विधानसभा क्षेत्र में राजग, महागठबंधन, जाप और रालोसपा के सभी उम्मीदवार राजपूत है. इस बार कोई भी पार्टी कोई रिस्क नहीं लेना चाहती. इसलिए हर किसी ने सामने वाली पार्टी के उम्मीदवार की जाति देखते हुए ही अपने उम्मीदवार को टिकट दी है.  

और पढ़ें: जाने मोदी सरकार द्वारा चलाया गया ‘स्वच्छ भारत अभियान’ के तहत कितना साफ़ हुआ

जरुरी मुद्दा गायब

बिहार लगभग हर मामले में देश के बाकी राज्यों से पीछे हैं. लेकिन कहीं भी इन सारी बातों जिक्र का  ही नहीं हो रहा है. इस विधानसभा के पहली चुनावी वर्चुअल रैली में मुख्यमंत्री नितीश कुमार ने जनता को संबोधित करते हुए कहा कि हर किसी को सरकारी नौकरी मिलनी संभव नहीं है. जबकि कोरोना की बात करें तो लगभग 22लाख प्रवासी दूसरे राज्यों से बिहार की तरफ वापस आएं हैं. इस दौरान कई लोगों  ने अपनी नौकरियां गवाई हैं. इतने बड़े मुद्दे पर अब तक किसी भी पार्टी ने  खुलकर अपनी चुनावी सभा में बात नहीं रखी है. दूसरी सबसे बड़ी समस्या बाढ़ है. हर साल बाढ़ के कारण  बिहार का लगभग आधा हिस्सा तबाह हो जाता है. लेकिन इस मुद्दें को भी पूरी तरह से गायब कर दिया गया है. इन सबके इतर सत्ताधारी पार्टी लालू के कार्यकाल का जिक्र करती है और लालू के सुपुत्र तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री के 15 साल के कार्यकाल का हिसाब मांगते नजर आते हैं.  शिक्षा की बात करें तो नीति आयोग की 2019 की रिपोर्ट के अनुसार देश के बड़े 20 राज्यों को सूची में बिहार 17 नंबर पर है. लेकिन इस मुद्दे पर कोई बात नहीं कर रहा है. गंदगी के मामले में स्वच्छ सर्वेक्षण 2020 की रिपोर्ट के अनुसार पटना सबसे गंदे शहरों में शुमार है. इन सबके बावजूद भी मुद्दों पर कोई बात नहीं हो रही.

और सम्बंधित लेख पढ़ने के लिए वेबसाइट पर जाएं www.hindi.oneworldnews.com

पार्टियां का चुनावी समीकरण

पार्टियों के चुनावी समीकरण के बारे में जब हमने बिहार के कशिश न्यूज चैनल के संपादक संतोष सिंह से बात की तो उन्होंने  बताया कि बिहार में चुनाव हमेशा से ही मुद्दों पर ही नहीं जाति के आधार पर होता है. इस बार भी ऐसा ही हाल है. 

एनडीए से अलग हुए लोजपा के बारे में बात करते हुए उन्होंने बताया कि लोजपा के अपने वोट बैंक से कोई खास प्रभाव नहीं  है. लोजपा ने पूर्व विधायकों को ही टिकट दिया है. बिहार में एनडीए का मुख्य स्त्रोत स्वर्ण हैं. लोजपा के इस समीकरण से स्वर्ण वोट बिखरे हैं. जहां भी जदयू के स्वर्ण उम्मीदवार नहीं होते थे वहां वोटर स्वर्ण होते थे. जिसके कारण वहां इस बार उन्होंने स्वर्ण उम्मीदवार खड़ा किया हैं. जहां कुशवाहा इनके स्पोर्टिंग वोट थे वहां कुशवाहा उम्मीदवार को टिकट दिया है. अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए संतोष सिंह कहते हैं अब सुशील मोदी और नितीश कुमार दोनों मे ही वह क्षमता नहीं रही है. जो एक पार्टी के नेताओं  में होनी चाहिए. दूसरा बड़ा कारण यह भी है कि इन लोगों ने राजनीति के जानकारों को चुन-चुनकर पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया है. जिसका असर वोट पर देखने को मिल सकता है.

पुष्पम प्रिय के प्लुरलस पार्टी का जिक्र करते हुए संतोष सिंह कहते है कि उनकी पार्टी हर विधानसभा क्षेत्र में 3 से 4 हजार तक वोट ले सकती हैं. वहीं लोजपा के बारे में उनका कहना है कि  चिराग पासवान का बिहार फर्स्ट बिहारी फर्स्ट का नारा वोटों में एक अंतर जरुर पैदा कर सकता है. 

क्या लोजपा कुछ अंतर स्थापित कर पाएंगी

इस बारे में स्वतंत्र पत्रकार जितेंद्र उपाध्याय का कहना कि रामविलास पासवान के बारे में कहा जाता है कि दलित नेता के रूप में उनकी एक बड़ी पहचान रही है .जिससे उनके मौत के बाद इस स्थान की रिक्तता चिराग पासवान कितना भर पाएंगे यह चुनाव परिणाम ही बताएगा मौजूदा समय में दलित चेहरा के रूप में लोजपा के जहां चिराग पासवान हैं वहीं राजग गठबंधन के हम नेता व पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी व जदयू के कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष अशोक चौधरी भी है. राज्य में दलित वोटों का प्रतिशत तकरीबन 16 फीसद माना जाता है वर्ष 2005 के चुनाव में चिराग को लोजपा को मिले वोट के प्रतिशत में लगातार कमी आई है सीटों की संख्या भी 2005 के बाद कभी दहाई में नहीं रहे इस बार लोजपा अलग होकर चुनाव लड़ रहा है इस समीकरण में रामविलास पासवान के मौत के चलते राज्य की राजनीति पर कोई खास असर नहीं पड़ने की उम्मीद है. मात्र दलित वोटों के कुछ हिस्से को अपने पक्ष में करने में चिराग सफल हो सकते हैं

जनता की क्या है राय

आम जनता की बात करें तो हर कोई अपने-अपने क्षेत्र की परेशानी को गिनाता है. रविवार को मेरी एक ऑटोवाले से इस बारे में बात हुई. बातों-बातों में उन्होंने बताया कि वो पार्टी के आधार पर नहीं अपने प्रतिनिधि को उनके काम के आधार पर वोट देंगे. ऑटो वाले का कहना है कि  उनके क्षेत्र में मौजूदा विधायक अरुण कुमार सिन्हा ने बहुत काम किया है इसलिए हमारा वोट उनको ही जाएगा.

बिहार के कलाकार कुंदन कुमार का कहना है कि सरकार कोई भी आए हमारे लिए कभी कुछ नहीं किया जाता है. जब भी चुनाव होता है भले ही लोकसभा या विधानसभा किसी भी पार्टी के घोषणा पत्र में कलाकारों का जिक्र नहीं किया जाता है. जबकि देखा जाएं तो हमारे देश में लगभग करोड़ों कलाकार है. इसलिए इस बार हमलोगों ने सोचा है जो भी पार्टी हमारी परेशानियों के बारे मे बात करेंगी. हमलोग उसे ही वोट देगें. नहीं तो हमलोगों ने इस बार नोटा दबाने का सोच लिया है. 

पटना निवासी ऋषि का कहना है कि किसी भी प्रदेश की सबसे अहम जरुरत शिक्षा और रोजगार है. लेकिन आप देख सकते हैं इन दोनों मुद्दों पर ही बात नहीं होती है. कोरोना के दौरान कितने लोग यहां वापस आएं है. लेकिन कोई भी पार्टी पर बात ही नहीं कर रही है. अब समय आ गया है कि जाति से ऊपर उठकर रोजगार और शिक्षा पर बात की जाएं. जिससे की बिहार आगे बढ़े.

इन सबके बाद अब देखने वाले बात यह है कि बिहार की जनता जाति या विकास किसके नाम पर वोट देगी.

अगर आपके पास भी हैं कुछ नई स्टोरीज या विचार, तो आप हमें इस ई-मेल पर भेज सकते हैं info@oneworldnews.com

Categories
वीमेन टॉक

जाने कौन है एकता जायसवाल, जो हैंडमेड कपड़ों को बढावा देने के साथ बुनकरों को दे रहीं है रोजगार

जाने बुनकरों को रोजगार देने वाली एकता जायसवाल के बारे में


आज के समय में हमारे देश में ज्यादातर कपड़े अब मशीनों से ही बनकर तैयार होते है. जबकि बहुत पहले से ही हमारा देश खादी और सूती कपड़े को हाथ से बनाने के हुनर के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है. लेकिन एक बार फिर हमारे देश में डिजाइनर कपड़ों को हाथ से बनाने का काम शुरू लिया गया है. इस काम को करने की शुरुआत नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी हैदराबाद के स्नातक की छात्रा एकता जायसवाल ने की है. एकता जायसवाल हैंड एंब्रायडरी और हाथों की कारीगरी के जरिए नए नए ब्रांड हस्तकथा के लिए ड्रेस डिजाइन करती है.

एकता जायसवाल बुनकरों और कारीगरों को देती है रोजगार

एकता जायसवाल बताती है कि वो अपने ब्रांड को बढावा देने के लिए ड्राइंग, एंब्रायडरी के साथ ही प्रिंटिंग का काम भी अपने हाथों से ही करती हैं. जैसे की हम सभी लोग देखते है कि आज के समय में ज्यादातर लोग अपने बड़े डिजाइनर और प्रोडक्शन को बढाने के लिए ज्यादातर मशीन का इस्तेमाल करते है लेकिन एकता जायसवाल अपने ब्रांड के कपड़ों को बनाने के लिए भारतीय कारीगरों का सहारा लेती हैं. जिससे की हमारे देश में हाथों से बने कपड़ों को बढावा मिले. साथ ही साथ बुनकरों और कारीगरों को रोजगार भी मिले.

और पढ़ें: जानें उस महिला के बारे में जिन्होंने ब्रिटिश शासन को मानवता पर कलंक कहा…

एकता जायसवाल अपने बिजनेस के लिए इस्तेमाल करती है ई-कॉमर्स वेबसाइट

एकता जायसवाल बताती है कि उन्होंने अपने एक बिजनेस की शुरूआत अपनी एक सहेली दिव्या के साथ की थी. एकता जायसवाल और दिव्या ने ये बिजनेस 2016 में मिलकर शुरू किया था. इसमें उन्होंने एक अमेरिकन ई-कॉमर्स वेबसाइट ‘इट्सी’ पर हस्तकथा को बेचना शुरू किया था. हस्तकथा के जरिए ही एकता जायसवाल लोककला और पारंपरिक कपड़ों के इस्तेमाल से लिनेन और कॉटन के गारमेंट्स बनाती हैं. इसमें वो लड़कियों के लिए मैक्सी ड्रेस, जंप सूट्स, स्कार्फ आदि डिजाइन के कपडे बनती है.

अगर आपके पास भी हैं कुछ नई स्टोरीज या विचार, तो आप हमें इस ई-मेल पर भेज सकते हैं info@oneworldnews.com