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ना करें भूलकर भी इन लोगों को ‘नमस्कार’ हो सकते हैं आपको नुकसान

किन-किन लोगों को नमस्कार करने से हमारा हो सकता है नुकसान


भारतीय संस्कृति के मुताबिक कोई भी भारतीय जब किसी से मिलते हैं तो हाथ जोड़कर, शीष झुकाकर नमस्कार करते हैं। ऐसा हमारी संस्कृति के मुताबिक करके हम सामने वाले व्यक्ति को आदर और सम्मान अर्पित करते हैं। ऐसा करने वाला व्यक्ति, विनम्र स्वभाव और अच्छे व्यवहार को दर्शाता है और हम सभी में ये सदगुण होना चाहिए ताकि जब भी हम किसी से मिले तो उनका सम्मान कर सके साथ ही उन्हें अपने व्यवहार से खुश कर सकें। लेकिन हम आपको बता दें कि शास्त्रों के अनुसार हमें हर किसी को नमस्कार नहीं करना चाहिए।

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जी हां, आपकी जानकारी के लिए बता दें कि गरुड़ पुराण के मुताबिक समाज में कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें नमस्कार करना हमारे संस्कृति के विरुद्ध माना जाता है अर्थात उन्हे नमस्कार करने से हम खुद का नुकसान कर सकते हैं।

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आइए जानते हैं कि किन-किन लोगों को नमस्कार करने से हमारा हो सकता है: –

1.कपटी और दिल का बुरा: यदि कोई इंसान छल-कपट करता है या फिर झूठ बोलता है, तो ऐसे व्यक्ति के सामने हमें कभी भी नमस्कार नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से आपका खुद का ही मान-सम्मान घटता है और साथ ही इससे कुंडली दोष भी बढ़ते हैं।

2.अंतिम संस्कार में जाता व्यक्ति: अंतिम संस्कार में जाते वक्त व्यक्ति को मौन रहना चाहिए। ऐसे में यदि हम उन्हें नमस्कार करते हैं तो उनका मौन टूट सकता है जिसकी वजह से कुंडली दोष भी बढ़ते हैं।

3.स्नान करता व्यक्ति: स्नान कर रहे व्यक्ति को कभी भी नमस्कार नहीं करना चाहिए क्यूंकि ये हमारे शिष्टाचार और संस्कार के विरुद्ध है। ऐसा करने से स्नान करने वाला व्यक्ति असहज हो सकता है और इससे कुछ प्रॉब्लम भी क्रिएट हो सकता है।

4.दौड़ता व्यक्ति: दौड़ते हुए व्यक्ति का पूरा ध्यान अपनी दौड़ पर होता है, ऐसे में उसे नमस्ते करने पर उसका ध्यान बट सकता है या फिर हो सकता है वो आपको जवाब ही ना दे पाए तो इससे अच्छा है कि आप उसके रुकने का इंतज़ार करें।

5.पूजा करते हुए: पूजा करते वक्त व्यक्ति का मन एकाग्र होता है। ऐसे में नमस्ते करने पर उनका पूरा ध्यान भंग हो सकता है, जिससे उसकी पूजा अधूरी रह सकती है और पूजा करने वाले इंसान के मन में कई और विचित्र ख्याल आ सकते है।

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सामाजिक

मां की ऐसी बातें जो बनाती है मां को दुनिया की बेस्ट माॅम

मां, एक ऐसी दोस्त जिसकी पहली प्राथमिकता आप होते है


हमारे समाज में मां का दर्जा भगवान् से भी ऊपर दिया गया हैं क्योंकि उनकी ममता असीम है। मां को अपना बच्चा दुनिया मे सबसे ज्यादा प्यारा होता है। मां-बच्चे में भावनात्मक रिश्ता बचपन से ही जुड़ जाते हैं। अगर पापा की डांट से बचना हो तो मां उसमें भी बच्चों की साइड लेकर पूरी मदद करती है। जब कभी बच्चा दुखी हो तो मां उसके दुख को अपना लेती है और दुखों को छू-मंतर कर देती है, इसीलिए तो वो एक मां कहलाती है।

मां और बच्चा

आज हम आपको ऐसी ही बातों के बारे में बताएंगे, जो मां को बैस्ट बनाती है:-

आपकी पहली टीचर

हर बच्चे की पहली टीचर होती है उसकी मां। क्योंकि बचपन में बच्चा जो कुछ भी सिखता है, वह सब कुछ अपनी मां से ही सिखता है। जैसे कि लोगों की रिस्पेक्ट करने से लेकर एक अच्छा इंसान बनना। ये सारे संस्कार बच्चों को मां ही सिखाती है।

खाने-पीने को लेकर चिंता

अरे, अपना टिफिन बॉक्स पूरा क्यों नहीं खाया? आज भूख क्यों नहीं लगी तुम्हें? कहीं बाहर जाने से पहले खाना खा कर जाना। इस तरह की बातें मां अक्सर अपने बच्चों से यहीं सब बातें पूूछा करती है। इन्हीं बातों से पता चलता है कि मां को अपने बच्चे की कितनी चिंता होती है।

पापा का गुस्सा, मम्मी बचाओ!

मां अपने बच्चों को बड़ी से बड़ी मुसीबतों से बचा लेती हैं। फिर वो मुसीबत कोई और हो या पापा का गुस्सा हो। मां को तो बीच में आना ही पड़ता है और इस तरह पापा की डांट से मम्मी बचा ही लेती है।

ब्रेकअप के बाद…!

अगर कभी बच्चों का ब्रेकअप हो जाए और बच्चे बेवजह अपना गुस्सा खाने पे निकाले तो मां दिलासा देती हुए कहती है कि “अरे वो तेरे लायक था/थी ही नहीं। मैं तेरे लिए इससे लाख गुणा अच्छा लड़का/लड़की ढूंढ लाऊगी!” तो रोना-धोना छोड़ और खाना खा अच्छी तरह से।

मां और बच्चा

एक्जाम मेरा, चिंता मां को!

एक्जाम अगर बच्चे का हो तो चिंता मां को लगी ही रहती है। कई रातें तो मां बच्चों के साथ बैठ कर गुजार देती है। कहीं बच्चे को नींद न आ जाए इसीलिए बीच-बीच में बच्चों को गर्माॉगर्म कॉफी या कुछ खाने को भी बना कर देती है।

आपके फ्रैंड्स मां के फ्रैंड्स

अगर कभी-कभार बच्चों के फ्रैंड्स घर पर आ जाए तो मां भी उनको पूरा प्यार देती है और उनका भी अपने बच्चे की तरह ही ख्याल रखती है। उनके साथ अपने ही बच्चे की तरह मजाक-मस्ती करती है। मां की यहीं बातेंं उनके बच्चों के करीब ला देती है।

आप बीमार, मम्मी परेशान

अगर बच्चा परेशान या बीमार होता है तो सबसे ज्यादा इस तकलीफ का अहसास मां को ही होता है। ऐसे में मां अपने सारे काम-काज छोड़कर आपके सिरहाने बैठ जाती है और आपसे बातें करती हैं ताकि आपका मन बहल जाए। आपके परेशानियों को दूर करने और आपके सेहतमंद होने की दुआए करती है।

आपका करियर उनका ख्वाब

जब बात आपके ख्वाहिशों और ख्वाबों की हो तो आपका ख्वाब भी मां का ख्वाब बन जाता है। वह आपके करियर को लेकर काफी चिंता करती है। आपके जीवन के हर पड़ाव पर सलहा देना चाहती है, जिनसे आपको थोड़ी-बहुत भी मदद मिल सके।

मानें या ना मानें शायद एक मां ही आपको सबसे पहले इंसान की परख करने का हुनर सि‍खाती है, अनुभवों से सीखने का दौर तो बहुत बाद में आता है। मां दरअसल एक ऐसी दोस्त है जिसकी पहली प्राथमिकता आप होते हैं, यानी वो आपकी बेस्ट फ्रेंड होती है।

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लाइफस्टाइल

क्यों महिला सुरक्षा अभी भी एक विचारणीय विषय है?

महिला सुरक्षा


महिला सुरक्षा” एक ऐसा संवेदनशील विषय है जिस पर जितनी चर्चा की जाए कम है। महिला यानि स्त्री जो काली, दुर्गा के रूप में पूजी जाती है और सभी की रक्षा करते हुए दुष्टों का संहार करती है – आज उसी की सुरक्षा की आवश्यकता क्यों पड़ी? ये विचारणीय प्रश्न है।

हम स्त्रियोचित, धर्म, संस्कार निभाने की बात स्त्रियों को कह तो सकतें है कि वो इसका पालन करें और अपने दायरे में ही रहें परंतु छोटी-छोटी अबोध बालिकाओं जिन्होने अभी बोलना, सुनना और समझना ही नहीं सीखा, वे पुरुषों की घृणित मानसिकता का शिकार होती है, तो उन संसकारों का क्या करेंगे? इन दिनों महिलाओं के साथ बलात्कार की बढ़ती घटनाओं ने सभी को झकझोर कर रख दिया है।

“निर्भया” हो या “गुड़िया”, ऐसा लगता है मानो सभी हमारे ही बीच वीरान आँखों से पुकारती हमसे इंसाफ की भीख मांगती दम तोड़ रही है और हम रैलियाँ निकालते, मोमबत्तियाँ जलाते, हाय-हाय करते अपने आप को माफ करते जा रहें है कि हमने इंसाफ के लड़ाई तो की। पर निष्कर्ष? कुछ नहीं। हम जितना ज्यादा प्रगतिवादी होते जा रहें हैं उतनी ही ज्यादा हमारी मानसिकता कुंठित और संकुचित होती जा रही है। शहर हो या गाँव, कहीं भी महिलाओं को अपने सुरक्षित होने का अहसास नहीं होता। यदि गहराई से सोचा जाये तो कौन इन सब बातों का जिम्मेदार है? जिम्मेदार केवल हम सब  ही हैं।

महिला सुरक्षा

एक ओर तो हम स्त्रियों की पूजा करतें हैं तो दूसरी ओर उन्ही से पुत्र प्राप्ति की कामना करतें हैं। पुत्र होने पर उन्ही को तिरस्कृत कर पुत्र की सेवा में लगे रहते हैं। इसीलिए पुत्र यानि पुरुष के मन में शुरू से ही स्त्रियों के प्रति श्रद्धा व आदर का भाव आ ही नहीं पाता है। यही मानसिकता लिए वे बड़े होते हैं व पीढ़ी दर पीढ़ी इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हैं।

आज जरूरत है इस सोच को बदलने की। सर्वप्रथम घर से ही स्त्रियों के प्रति आदर व सम्मान की भावना की शुरुआत होनी चाहिए। महिलाओं की सुरक्षा तो सब जगह है और कहीं भी नहीं है। सिर्फ हमारी सोच और व्यवहार ही उसे बनाता और बिगाड़ देता है। आज हम जितना भी महिलाओं को अधिकार दे दे पर यदि हम मन से स्त्रियों का सम्मान नहीं करतें हैं तो उन अधिकारों का कोई औचित्य ही नहीं है।

फिर भी महिलाएँ अपने आप से सुरक्षा के कुछ ऐसे इंतजाम सकतीं हैं जिससे वे स्वयं सुरक्षित हो सकें, जैसे अपने आसपास के वातावरण पर नज़र रखें, संदिग्ध व्यक्तियों पर पैनी दृष्टि रखेँ और उनको अपने घर के आसपास फटकने न दे और छोटी बच्चियों को घर में व घर के आस पास अकेला न छोड़े। लड़कियों को चाहिए कि वो अपने पास कुछ ऐसी सामग्री हमेशा साथ रखें जैसे, पेपर स्प्रे , छोटा चाकू, पिन इत्यादि। माता पिता का दायित्व है कि वो अपने बच्चों को अच्छा ज्ञान दें, संस्कार दें जिससे उनमें स्त्रियॉं के प्रति अच्छे विचार रहें और उनकी रक्षा करने का भाव रहे। सरकार की ओर से भी सख्त कानून बनने चाहिए जिसमें बचाव का सीधा रास्ता न हो।

लड़कियो को शिक्षित करे और उन्हें सिखाये

जगह-जगह पुलिस बीट बॉक्स लगने चाहिये व उनमें 24 घंटे पुलिस कर्मी तैनात रहने चाहिए। पीसीआर वैन को लगातार गश्त लगाते रहना चाहिए, सुनसान इलाकों में बिजली की व्यवस्था अच्छी होनी चाहिए। खंडहर, वीरान पड़ी इमारतों में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम होने चाहिए। किसी भी प्रकार की शिकायत पर तुरंत कार्यवाही होनी चाहिये। लड़कियों को प्राथमिक शिक्षा से ही अपनी सुरक्षा के उपाय सिखाये जाने चाहिए, उन्हे जूडो-कराटे, टाइक्वांडो आदि की ट्रेनिंग मिलनी चाहिए।

सबसे बड़ी बात, घर के बड़े बुजुर्ग उनको मानसिक रूप से शक्तिशाली बनाए जिससे उनमें आत्म विश्वास जागे। महिला सुरक्षा के लिए सम्मेलन आयोजित करने से ज्यादा उनका ध्यान रखने की आवश्यकता है। ये जरूरी नहीं कि स्त्रियाँ घर के अंदर ही सुरक्षित हैं। उन्हे तो केवल इस आश्वासन की जरूरत हैं कि वो जहां कहीं भी जाएँ वहाँ किसी की गिद्ध दृष्टि उन पर न पड़े। केवल अपने आत्मविश्वास के साथ वो हर दिशा में कदम बढ़ा सकें।

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