कपड़े के अभाव मे यहां की महिलाएं मासिक धर्म में राख का इस्तेमाल करती थी

जाने कौन है स्वाति बेडेकर, जिन्होंने गांव की महिलाओं को मुहैया कराएं सस्ते पैड


मासिक धर्म एक ऐसा समय है जो हर महीने प्रत्येक स्त्री के जीवन में आता है. लेकिन देश में कई  महिलाओं ऐसी है जिन्हें इसके बारे में पूरी जानकारी नहीं होती. कहना का तापर्त्य यह है कि उन्हें उनसे होने वाली बीमारियां एवं उनके रोकथाम के बारे में सही जानकारी नहीं होती है. ये हमारे देश का काला सच है कि आज 21वीं सदी में भी हम लोग मासिक धर्म को लेकर खुल के बात नहीं कर पाते. आज भी हमारे देश में बहुत सारी महिलायें ऐसी है जो अपने मासिक धर्म के समय पर सैनिटरी पैड की जगह पुराना कपडा यूज़ करती है. जिसके बारे में उनको पता तक नहीं होता कि यह उनकी सेहत के लिए कितना खतरनाक है.

जाने कौन है स्वाति बेडेकर

स्वाति बेडेकर मासिक धर्म के दौरान जरूरी स्वच्छता को लेकर गुजरात में जागरूकता फैलाने वाली एक महिला है. एक दिन वह गुजरात के एक गांव में गयी तो वहां महिलाओं की बातों ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया. उन महिलाओं की कहानी सुनने के बाद स्वाति बेडेकर को पता चला कि कैसे गांव की महिलाओं की जिंदगी हर महीने दांव पर लग जाती है. हर महीने महिलाओं के स्वास्थ्य के साथ होने वाले खिलवाड़ के लिए वे खुद जागरुक होने के लिए तैयार नहीं थी. लेकिन स्वाति बेडेकर ने कभी हार नहीं मानी. लाखों जतन के बाद आखिर उनकी जीत हुई. आज स्वाति बेडेकर ‘वात्सल्य फाउंडेशन’ की मदद से सस्ते सैनेटरी पैड बना रही हैं.

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गांव की लड़कियों को भी कर रही शिक्षित

स्वाति बेडेकर सरकार के एक प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए गांव-गांव में जाती थी. जहां पर उन्हें कई बार बच्चों को पढ़ाना भी पड़ता था. जब स्वाति बेडेकर कक्षा में पढ़ाती थी तो वो देखती थी कि कक्षा में में कुछ बच्चियां चार-पांच दिनों के लिए गायब हो जाती थी. जब उन्होंने इस बारे में उन बच्चियों से पूछा तो उन्होंने कहा कि वो पीरियड के कारण स्कूल नहीं आती हैं. बच्चियों ने कहा कैसे स्कूल आएं, खून बहता रहता है. यह सब सुनने के बाद स्वाति बेडेकर हैरान हुई कि कैसे 21वीं सदी में भी महिलाएं इस तरह का जीवन जीने के लिए मजबूर हैं. उसेक बाद उन्होंने इस बारे में गांव की महिलाओं से बात की तो उन्होंने बताया कि जब उनके पास ब्लीडिंग रोकने के लिए पुराना कपड़ा नहीं होता है तो वो राख और मिट्टी का इस्तेमाल करती हैं. ये सब सुनने के बाद स्वाति ने उन महिलाओं को जागरूक करने के बारे में सोचा. गांव की महिलाएं पैड्स को शहर की चीज समझ कर प्रयोग करने से मना कर देती थीं. ऐसे समय में उन्होंने सोचा की महिलाओं को सस्ते पैड कैसे उपलब्ध करवाएं. इसके लिए स्वाति ने इंटरनेट की सहायता ली. दिन रात एक-एक करके आखिरकार महिलाओं को सस्ते पैड उपलब्ध कराये.

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