देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस विपक्ष के रुप में अपने आप साबित नहीं कर पाई

2022 में यूपी क्या कांग्रेस अपना वोटबैंक मजबूत कर पाएगी.


देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस में पिछले कई सालों से नेतृत्व की कमी साफ नजर आती है. जिसका सीधा असर पार्टी में देखने को मिलता है. नेता अपने स्वार्थ को आगे रखते हुए किसी दूसरी पार्टी में शामिल हो जा रहे हैं और एक बार फिर पार्टी कमजोर हो जाती है. तो चलिए आज “काम की बात” में कांग्रेस के कमजोर होते कारणों के बारे में बात करें.

अहम बिंदु

–         कांग्रेस के बीच के लोग ने थमा बीजेपी का हाथ

–         एक दूसरे पर लगाए जा रहे हैं आरोप प्रत्यारोप

–         जमीनी स्तर पर जनता से मिलने का अभाव

–         अच्छा विपक्ष बन पाने में विफल रही कांग्रेस

2014 के बाद बदला कांग्रेस का इतिहास

याद करें साल 2014 का लोकसभा चुनाव. जहां से कांग्रेस के कमजोर होने की कहानी शुरु हुई. इससे पहले 10 साल तक कांग्रेस का ही देश में राज रहा था. लेकिन 2014 चुनाव का वह नारा जहां लोगों से एक ही सवाल पूछा जा रहा था कांग्रेस ने 70 सालों में देश का क्या दिया. ज्यादातर लोगों का जवाब होता था कुछ नहीं, इसके बाद यही से शुरु हुई बीजेपी के मजूबत और कांग्रेस की कमजोर होने की कहानी. बात यहां तक आ गई कि साल 2018 में देश के 29 राज्यों में से 21 में बीजेपी की सत्ता थी. लगभग देश का आधा से अधिक हिस्सा भगवा हो चुका था. जहां हर सोशल मीडिया पर भारत के नक्शे को भगवा रंग में शेयर किया जा रहा था. यह सारी चीजें कांग्रेस को और कमजोर कर रही थी. साल 2018 के छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्यप्रदेश में चुनाव के बाद कांग्रेस ने यहां वापसी की. इसके पीछे एक कारण यह भी माना जा रहा था कि यहां पिछले पंद्रह सालों से बीजेपी का राज्य था. लोग बदलाव चाह रहे थे. लेकिन इन बावजूद मध्यप्रदेश में बहुत लंबे समय तक कांग्रेस की सरकार न चल पाई. कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के मनमुटाव के कारण सिधिंया और उनके विधायकों ने बीजेपी का दामन थाम लिया और कांग्रेस को सत्ता से हाथ होना पड़ा. इस घटना के पीछे एक बड़ा कारण यह भी बताया जा रहा था कि सिंधिया मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बनने चाहते थे  जबकि उनकी जगह कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाया जाना. बीजेपी में शामिल होते हुए सिंधिया ने कहा था कि जो कांग्रेस पार्टी पहले थी अब वह वैसी नहीं रह गई, वहां नए नेतृत्व और विचारधारा को स्वीकार नहीं किया जा रहा है. यह सारी चीजें कोरोना काल के दौरान हुई. वहीं दूसरी ओर यह हाल राजस्थान में भी हुआ सचिन पायलट और अशोक गहलोत के बीच मनमुटाव की खूब खबरें लाई लेकिन सत्ता नहीं गई.

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नेतृत्व की कमी

राजनीति में आरोप प्रत्यारोपों का सिलसिला तो हमेशा चलता रहता है. लेकिन कांग्रेस पार्टी को लेकर अन्य पार्टियों और जनता का हमेशा यह कहना है कि कांग्रेस सिर्फ गांधी परिवार की ही पार्टी है. यहां गांधी परिवार से इतर कोई और अध्यक्ष नहीं बन सकता है. इसी साल अगस्त में पार्टी के अंतरिम फैसले के बाद सोनिया गांधी को एक बार फिर अध्यक्ष बनाया गया. जबकि इसी बैठक से पहले कांग्रेस की कुछ नेताओं ने पार्टी में सुधार को लेकर चिट्ठी लिखी थी. इस चिट्ठी से यह कयास लगाया जा रहा था कि अब लोग कांग्रेस की कार्यसमिति में कार्यकर्त्ताओं के कार्यभार में बदलाव चाह रहे हैं. लेकिन बाद में यह बात पूरी तरह दब गई. अभी कुछ दिन पहले ही  कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद ने शीर्ष नेताओं का बिना नाम लेते हुए निशाना साधते हुए कहा था कि कांग्रेस सबसे निचले स्तर पर है. पार्टी के बड़े कार्यकर्ता से संपर्क टूट गया है. फाइव स्टार होटलों में बैठकर चुनाव नहीं लड़े जा सकते. उन्होंने यह बात कांग्रेस की बिहार चुनाव में हार के बाद कही. वह यही नहीं रुके अपनी  बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि जो लोग वहां होते हैं उनका कनेक्ट लोगों के साथ टूट गया है. ब्लॉक लोगों के साथ, जिलों के लोगों को साथ कनेक्शन टूट गया है. उन्होंने कहा कि पार्टी की सबसे बड़ी समस्या यह है कि अगर कोई व्यक्ति पदाधिकारी बनता है तो वो लेटर पैड तो छपा देता है और विजटिंग कार्ड बना लेते है. वो समझता है कि मेरा काम बस खत्म हो गया. जबकि काम तो उस वक्त शुरु होता है. गुलाम नबी का यह बयान दर्शा रहा है कि पार्टी के लोगों में समर्पण की कमी है. खैर पार्टी के वरिष्ट नेता भी जनता के साथ अपना कनेक्शन नहीं बना पा रहे हैं तो अन्य का क्या कहना. ज्यादातर लोग सोशल मीडिया के दौर में सिर्फ सोशल मीडिया पर ही अपनी बात को ही रख रहे हैं. जबकि कांग्रेस का बड़ा वोट बैंक ऐसा  है जिन्हें सोशल मीडिया द्वारा नहीं ब्लकि जमीनी स्तर पर मजबूत करने की जरुरत है.

राहुल गांधी और प्रियंका गांधी का रोल

कांग्रेस पार्टी के अहम लोगों में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी का नाम ही सबसे पहले लिया जाता है. आम जनता के लिए कांग्रेस का मतलब ये लोग ही है. लेकिन क्या यह दोनों लोगों तक पहुंच पा रहे हैं. लगातार लोगों की आलोचना करने के बाद कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने जमीन पर लोगों से मिलना शुरु किया है. राहुल गांधी कुछ समय के लिए एक्टिव होते हैं उसके बाद फिर से सोशल मीडिया से ही बदलाव लाने का सपना देखने लगते हैं. कोरोना के दौरान राहुल गांधी की एक वीडियो बहुत ज्यादा वायरल हुई था जहां वह लोगों से मिल रहे हैं. जमीन पर बैठकर उनकी परेशानियों को सुन रहे हैं. और अंत में अपनी गाड़ी से प्रवासी मजदूरों को उनके घर छोड़कर आते हैं. लेकिन उसके कुछ समय के बाद फिर से  वह सोशल मीडिया पर आ जाते हैं. जमीनी स्तर लोगों से फिर दूर हो जाते हैं. हाथरस वाले कांड पर जाते हैं जबकि पंजाब और राजस्थान वाले मामले में चुप्पी लोगों के बीच एक गलत संदेश को देती है. जरुरी है की जमीनी स्तर पर काम किया जाए. बिहार चुनाव में भी कांग्रेस 70 सीटों में से महज 20 सींटों में ही जीत हासिल कर पाई. अच्छे विपक्ष के तौर पर वहां भी काम नहीं कर पाएं. पीएम मोदी जहां  12 रैलियां कर रहे थे वही राहुल गांधी ने मात्र 8 रैलियां ही की. विपक्ष के तौर पर सिर्फ तेजस्वी यादव ही अपनी भूमिका में नजर आएंगे. जिन्होंने सबसे ज्यादा रैली की. बात करें प्रियंका गांधी की तो वह लगातार लोगों से मिलजुल रही है. कोरोना के दौरान भी प्रवासी मजदूरों की मदद करने के लिए आगे आई थी. सोशल मीडिया में एक्टिव होने के साथ-साथ जमीनी स्तर पर भी यूपी  में लोगों से मिलती है. हर मुद्दे पर योगी सरकार से सवाल उठाती है. अब देखना यह है कि आने वाले यूपी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस अपना खोया हुआ वोटबैंक कितना मजबूत कर  पाती है.

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विपक्षी के तौर विफल रही कांग्रेस

जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के प्रस्ताव के साथ ही सड़कों पर भारी हलचल मचा दी. लेकिन संसद में विपक्ष इसे गलत साबित करने के लिए कोई अच्छा तर्क देने में बहुत ही कमजोर रहा. विपक्ष में कांग्रेस के पास इस मामले में कोई मजबूत तर्क नहीं दिया जिसके कारण वह अन्य पार्टियों को फैसले के  खिलाफ मतदान करने की अनुमति दे सकता था. बीजेपी सरकार ने राजद्रोह कानून में संशोधन किया था जिसमें दावा किया गया था कि किसी भी नागरिक को जो किसी भी राष्ट्र विरोधी गतिविधि में लिप्त या लिप्त माना जाता है उसे राजद्रोह कानून के तहत अरेस्ट किया जा सकता है. एक व्यक्ति को बिना किसी सबूत के किसी भी राष्ट्रविरोधी गतिविधि में शामिल माना जा सकता है. इसमें भी विपक्ष संशोधन के खिलाफ एक तर्क देने में विफल रहा और अंततः राजद्रोह कानून में संशोधन को मंजूरी दे दी गई.

कांग्रेस न केवल ऐतिहासिक संगठन और उसके कारण को एक नई दिशा देने में विफल रही है, बल्कि यह वर्तमान सरकार के खिलाफ एक एजेंडा खोजने में भी विफल रही है. 2006 में डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा प्रस्तावित जीएसटी बिल, जिसकी कल्पना अटल बिहारी वाजपेयी ने की थी. बीजेपी नेताओं ने एक मजबूत तर्क दिया. इस प्रतिरोध ने विपक्ष को बिल पास न करने में मदद की. हालांकि, वित्त मंत्री के रूप में अरुण जेटली के कार्यकाल के दौरान, 2017 में जीएसटी बिल पारित किया गया था. कमजोर विपक्ष फिर से प्रतिरोध दिखाने में सक्षम नहीं.

हाल ही में, कोरोनोवायरस के बारे में बहुत सारी बातें हुई हैं. प्रधानमंत्री ने नागरिकों से आग्रह किया कि वे COVID-19 के खिलाफ लड़ने के लिए गठित पीएम केयर फंड  में दान करें. कई हस्तियों, कॉरपोरेट्स, आम लोगों ने दान दिया. सरकारी कर्मचारियों की तो एकदिन की वेतन में कटौती की गई. लेकिन इन सबके बाद आश्चर्यजनक तरीके से  पीएम केयर फंड की जवाबदेही पर सरकार ने रोक लगा दी.  फंड को सूचना के अधिकार अधिनियम से हटा दिया. जबकि अगर यह सूचना के अधिकार के तहत होता  तो सरकार को इसका जवाब देना पड़ता. हाल ही में कृषि बिल पर भी विपक्ष की सभी पार्टियां ही एक्टिव दिखी उसके बाद माहौल शांत होता गया. अब इसको लेकर 26 नवंबर को हड़ताल का आहवान किया गया है. देश के अलग-अलग हिस्सों से किसान राजधानी में प्रोटेस्ट करने करने आ रहे हैं.

किसी भी देश का मजबूत विपक्ष ही लोकतंत्र को मजबूत बनता है. जहां जनता से जुड़े मुद्दों पर सवाल उठाए जाए. जहां जनता की बात को तवुज्जो दिया जाए. इसलिए जरुरी है हर परिस्थिति में विपक्ष को सतर्क रहने की जरुरत है. नहीं तो बिना मजबूती के सत्तापक्ष आपके सवालों को तवज्जो नहीं देगा.

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