जाने कौन है रानी दुर्गावती, जिन्होंने आखिरी सांस तक मुगलों से लड़ी लड़ाई

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कौन है रानी दुर्गावती


हमारा देश हमेशा से ही एक पुरुष प्रधान देश रहा है. जहां महिलाओं को हमेशा ही पुरुषों की तुलना में कम आका जाता है. इतना ही नहीं महिलाओं को कोमल और कमजोर समझा जाता है. जबकि पुरुषों को फौलाद की संज्ञा दी जाती है. माना की प्रकृति ने महिलाओं को सुकोमल बनाया है. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि महिलाएं कमजोर है. अगर हम अपना इतिहास उठा कर देखे तो रानी लक्ष्मी बाई, चांद सुल्ताना, रानी अवंतीबाई, रानी चेनम्मा ये कुछ ऐसी महिलाएं है जिन्हे इतिहास घूंघट की ओट में नहीं बल्कि तलवार की चोट के लिए आज भी याद करता है. आज हम आपको ऐसी ही एक रानी के बारे में बताने जा रहे है. जिन्होंने अपनी आखिरी सांस तक मुगलों से लड़ी लड़ाई थी.

रानी दुर्गावती ने मुगलों से आखरी सांस तक लड़ी लड़ाई

रानी दुर्गावती का जन्म 5 अक्टूबर 1524 को हुआ था. इनका नाम ‘दुर्गावती’ रखने के पीछे भी एक विशेष कारण है. दुर्गाष्टमी के दिन बुंदेलखंड के कालिंजर में कीर्तिसिंह चंदेल के घर एक बेटी का जन्म हुआ. दुर्गाष्टमी के दिन बेटी का जन्म होने के कारण उन्होंने अपनी बेटी का नाम दुर्गावती रख दिया था. अगर हम बात करें दुर्गावती की वीरता की, तो उन्होंने अपना हुनर दिखने के लिए बड़ी उम्र का इंतजार नहीं किया. दुर्गावती ने अपने पिता के संरक्षण में जल्द ही तलवारबाजी, भाला फेंकना और घुड़सवारी सीख ली थी. जब भी दुर्गावती के पिता शिकार पर जाते तो वो भी साथ जाती थी. जिसके कारण उन्होंने छोटी सी उम्र में ही शिकार की बारीकियां सीख ली थी.

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छोटी सी उम्र में ही रानी दुर्गावती की वीरता के चर्चे उनके राज्य में तथा राज्य के बाहर भी होने लगे थे. दुर्गावती की इस बढती हुई ख्याति ने गढ़ा मंडला जिले के शासक संग्राम सिंह को उसकी तरफ आकर्षित किया था. ये बात तो सभी लोग जानते थे कि दुर्गावती जितनी सुन्दर है उससे कई गुना तेज उसके तलवार की धार है. दुर्गावती के बारे में ये सारी चीजें संग्राम सिंह पहले ही सुन चुके थे और उन्होंने मन ही मन दुर्गावती को अपनी पुत्रवधू मान लिया था. संग्राम सिंह अपने पुत्र दलपत शाह के लिए ऐसी ही कन्या चाहते थे जो राज्य के विस्तार और कुशल शासन में उनके पुत्र का हाथ बंटा सके. इसलिए संग्राम सिंह ने कीर्ति सिंह के पास अपने पुत्र के विवाह का प्रस्ताव भेजा. लेकिन कीर्ति सिंह ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया. इस बात से नाराज हो कर संग्राम सिंह ने कीर्ति सिंह को युद्ध के लिए चुनौती दी, और कहा अगर तुम पराजित हुए तो तुम्हारी पुत्री हमारी पुत्रवधू बनेगी. जिसे कीर्ति सिंह ने स्वीकार कर लिया.

मुगलों से लड़ते-लड़ते वीरगति प्राप्त की

अगर आप भारत का इतिहास उठा कर देखे, तो रानी दुर्गावती की वीरता और साहस के किस्से स्वर्णिम अक्षरों में लिखे हुए है. उन्होंने अपनी वीरता का उदाहरण  मुगल शासकों से डटकर सामना करके दिया. इतना ही नहीं रानी दुर्गावती का शौर्य, पराक्रम और जौहर को देखकर अकबर ने भी हार मान ली थी. रानी दुर्गावती एक ऐसी वीरांगना थीं, जिन्होंने अपने जीवन में काफी ज्यादा संघर्ष किये और पति की मौत के बाद न सिर्फ अपने राज्य की शासक बनी, बल्कि एक साहसी शासक की तरह अपने राज्य की रक्षा भी की और मुगलों से युद्ध करते करते वीरगति को प्राप्त हुईं।

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