जाने भारत की पहली महिला डॉक्टर रखमाबाई राउत के बारे में, जिन्होंने बचपन में हुई शादी के खिलाफ किया था संघर्ष

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DR. Rakhmabai raut

जाने कौन है डॉक्टर रखमाबाई राउत


रखमाबाई राउत भारत की पहली महिला डॉक्टर थी. उनका जन्म 1864 में महाराष्ट्र में हुआ था. रखमाबाई की शादी उनकी विधवा माँ ने महज 11 साल में करा दी थी. हालांकि वो कभी भी अपने पति के यहाँ रहने नहीं गईं.  रखमाबाई की शादी के बाद उनकी माँ ने एक सर्जन सखाराम अर्जुन के साथ शादी कर ली. रखमाबाई की माँ ने जब शादी की तो वो छोटी ही थी उन पर उनके सौतेले पिता का काफ़ी असर था. रखमाबाई अपने सौतेले पिता के पास जाने से इनकार करती थी. उस समय इस पर काफ़ी हंगामा मचा था. वह इस बात पर अड़ी रहीं कि वो उस शादी के बंधन में नहीं रहेंगी जिसमें उनकी मर्जी नहीं है.

रखमाबाई ने 22 साल की उम्र में तलाक के लिए कोर्ट में लड़ाई लड़ी

रखमाबाई भारत की पहली महिला डॉक्टर होने के साथ-साथ भारत की शुरुआती नारीवादियों में से एक थीं. उन्होंने बचपन में हुई शादी से तलाक लेने के लिए 22 साल की उम्र में कोर्ट में लड़ाई लड़ी. जिस समय रखमाबाई ने तलाक के लिए लड़ाई लड़ी उस समय पुरुषों का अपनी पत्नियों को छोड़ देना या फिर तलाक दे देना, आम बात थी. लेकिन किसी महिला का अपने पति को तलाक देना एक बहुत ही बड़ी बात थी शायद रखमाबाई वो पहली भारतीय महिला थीं जिन्होंने अपने पति से तलाक की मांग की. रखमाबाई के इस कदम ने उस समय के समाज को हिला कर रख दिया.

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तलाक की लड़ाई में कोर्ट ने रखमाबाई को दो विकल्प दिये

रखमाबाई ने जब अपने पति से तलाक लेने के लिए कोर्ट में अपील की तो उस समय कोर्ट ने उन्हें दो विकल्प दिये, पहला अपने पति के पास चली जाएं और दूसरा छह महीने के लिए जेल जाएं. उस समय रखमाबाई ने जबरदस्ती की शादी में रहने से अच्छा जेल जाना समझा. वो जेल जाने को तैयार हो गयी। उनका उस समय जेल जाने का फैसला काफी साहसिक और ऐतिहासिक था. उस समय में स्वतंत्रता सेनानी बालगंगाधर तिलक ने भी अपने अखबार में उनके खिलाफ छाप. उन्होंने रखमाबाई को हिंदू परंपराओं पर एक धब्बे के रूप में परिभाषित किया.

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