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बैलों का खास दिन है पोला पर्व, सबसे ज्यादा विदर्भ में मनाया जाता है

मिट्टी के बैल की पूजा की जाती है


हमारे घर में पकने वाले अन्न मे जितना योगदान खेतों का है. उतना ही मवेशियां का भी है. आधुनिक जमाने में भले ही हमने खेत जोतने और कटाई के लिए मशीनों का प्रयोग शुरु दिया हो, लेकिन आज भी मझोले और छोटे किसान इन मवेशियों का ही सहयोग लेते हैं. इन मवेशियों को सम्मान देने के लिए महाराष्ट्र, कर्नाटक में “पोला” त्यौहार मनाया जाता है.

अन्नमाता गर्भधारण करती है

पोला त्यौहार भादों माह की अमावस्या को मनाया जाता है. जिसे पिठोरी अमावस्या कहा जाता है. ऐसा माना जाता है कि अगस्त- सितंबर में खेती किसानी होने के बाद अन्नमाता गर्भ धारण करती है. और इसी खास दिन धान के पौधों में दूध भरता है. यह सबसे ज्यादा महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके में मनाया जाता है. जिसकी धूम गांवों में ज्यादा होती है.

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Pola festival

बैल के लिए खास दिन

पोला का दिन खासतौर पर बैलों का दिन होता है. आज के दिन बैल को आजादी का एहसास दिलाया जाता है. सबसे पहले उसके गले और नाक से रस्सी बाहर निकाली जाती है. उसके बाद बेसन और हल्दी का लेप लगाते हैं. तेल से मालिश की जाती है. इन सबके बाद गर्म पानी से नहलाया जाता है. इसके बाद तरह-तरह के फूलों और जेवरों से सजाया जाता है साथ ही पीठ पर सुंदर शाल दी जाती है. अंत में बाहर घूमने ले जाता है.

पूरम पोली है खास व्यंजन

घर के अलग-अलग सदस्यों के लिए पोला का महत्व भी अलग है. स्त्रियां आज के दिन अपने मायके जाती हैं. छोटे बच्चे मिट्टी का बैल बनाकर उसकी पूजा करते हैं. आज के दिन मुख्य रुप से पूरम पोली, गुझिया, वेजीटेबल करी और पांच तरह की सब्जी मिलाकर मिक्स सब्जी बनाई जाती है.

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