काम की बात करोना

बॉलीवुड और राजनीति के अलावा भी हर क्षेत्र में फैला है नेपोटिज्म

बहुत बड़ा सामाजिक सिस्टम है जिसे एकदिन में बदल पाना संभव नहीं है


अहम बिंदु

• क्या नेपोटिज्म अच्छा है?

• नेपोटिज्म हर जगह है

• नेपोटिज्म की जड़े बहुत मजबूत है

• क्या यह खत्म हो पाएगा?

रविवार की वह तपती धूप ने देश के लगभग हर व्यक्ति को हिला दिया। जब खबर मिली एक्टर सुशांत सिंह राजपूत ने आत्महत्या कर ली। कोई इसे मानने से इंकार कर रहा था तो कोई श्रद्धांजलि के तौर पर सोशल साइट पर पोस्ट डाल रहा था। आत्महत्या से हर कोई सदमे में आ गया है। सब यही जानना चाहते थे कि आखिर ऐसा क्या हुआ होगा कि सुशांत ने मौत को गले लगा लिया। सवाल पूछने का सिलसिला शुरु हुआ तो कई तरह की बातें बाहर निकलकर आई। जिसमें एक सबसे महत्वपूर्ण थी ‘नेपोटिज्म’ की। इस शब्द ने खूब तूल पकड़ा। इसी के साथ बॉलीवुड के कुछ लोगों पर नेपोटिज्म का आरोप लगा।  जिसका सोशल मीडिया पर जमकर बहिष्कार करने की बात की जा रही है। लेकिन क्या सच में लोग इनका बहिष्कार कर पाएंगे। फिल्म देखने वाले कई लोगों को तो सही से यह तक पता नहीं होता है कि किस प्रोड्क्शन हाउस की फिल्म है। जब लोगों को यही पता नहीं होगा तो बहिष्कार कैसे हो पाएगा?

बॉलीवड में नेपोटिज्म का यह पहला मामला नहीं है, इससे पहले भी कई बार आवाजें उठती रही है। कंगना रन्नौत ने पहले भी खुलकर इसके बारे में कहा था। लेकिन तब हमारा ध्यान उस तरफ नहीं गया था। समय को अगर पहले ही भापा होता तो शायद आज सुशांत हम सबके बीच में होते। जितनी खबरें आज उनके मरने के बाद दिखाई जा रही है, क्या यह पहले नहीं बताई जा सकती थी? आज लगभग हर किसी को उसके जीवन की एक-एक उपलब्धि गिनाई जा रही है, आखिर ऐसा क्यों?

क्या नेपोटिज्म अच्छा है?

जबसे सुशांत की मौत की खबर आई है, हर कोई नेपोटिज्म के खिलाफ खड़ा हो गया है। लोग अपनी-अपनी तरह से इसे खत्म करने का कथन कह रहे हैं। लेकिन क्या यह इतना आसान है? फिल्ममेकर रामगोपाल वर्मा ने ट्विटर के जरिए अपनी बात रखते हुए कहा है “नेपोटिज्मम के बिना समाज बिखर जाएगा क्योंकि परिवार से प्यार ही समाज का आधार है। जैसे आप दूसरे की पत्नी से ज्यादा प्यार नहीं कर सकते और आप दूसरों के बच्चों से भी अपने बच्चों से ज्यादा प्यार नही कर सकते ”। इनकी बात को कई लोग सही भी ठहरा रहे हैं। लेकिन टैलेंट को ताक पर रखकर किसी और को आगे बढ़ाना कहां तक सही है।

क्रेक्सन फिल्म प्रोडक्शन की फिल्ममेकर और राइट कृति नागर शर्मा का कहना है कि नेपोटिज्म तो हर फील्ड में है लेकिन बॉलीवुड में दिख जाता है। लेकिन यह कहना गलत नहीं होगा कि बॉलीवुड में नेपोटिज्म के जरिए टैलेंट की अनदेखी की जा रही है। यहां ऐसे बहुत सारे लोग है जिन्हें बहुत कुछ सीखने की जरुरत है। लेकिन उनके पास एक ऐसा सरनेम है जिसे इंडस्ट्री में भुनाया जा सकता है। इंडस्ट्री बाहर से देखने में तो बहुत रंगीन लगती है लेकिन इसकी काली सच्चाई तो अब सामने आई है।  राजा का बेटा राजा बने इसमें कोई बुराई नहीं है, लेकिन उसमें राजा के लायक गुण भी तो हो। कृति अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहती है बॉलीवुड में आजकल रीमैक्स के नाम पर पुराना कंटेट रीपीट हो रहा है। चाहे रीमिक्स गाने हो या फिल्म। इसका मुख्य कारण है नए टैलेंट को पूछा ही नहीं जा रहा है। यह मामला सिर्फ कलाकारों तक ही सीमित नहीं है। बल्कि, यह समस्या तो हर लेवल पर है। बॉलीवुड में एंट्री लेना उन लोगों के लिए आसान है जिनके पास बड़ा नाम हो भले ही टैलेंट न हो।

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नेपोटिज्म हर जगह है

नेपोटिज्म का मामला सिर्फ बॉलीवुड और पॉलिटिक्स तक ही सीमित नहीं है। एक चपरासी की नौकरी से लेकर अफ्सरों तक इसकी जड़ें फैली हुई है। लेकिन मामला यह है कि लोगों का ध्यान कभी यहां तक जाता ही नहीं है। हर दफ्तर में इंटरव्यू से पहले ही कुछ लोग नौकरी के लिए सेलेक्ट होते हैं। टैलेंट को वहां भी मारा जाता है लेकिन यह बहुत कम ही दिखाई देता है। आईआईएमसी के पास आउट स्टूडेंट अभिषेक का कहना है कि आईआईएमसी से पढ़ने के बाद भी उनके टैलेंट को वो मुकाम नहीं मिल पा रह है जिसके वो हकदार है।

एक इंटरव्यू का जिक्र करते हुए वह कहते है, मैं एक दिन देश के एक प्रतिष्ठित न्यूज चैनल में इंटरव्यू देने गया। मेरा इंटरव्यू भी बहुत अच्छा हुआ लेकिन मेरा सलेक्शन नहीं हुआ। इसका कारण था जो शख्स मेरे साथ इंटरव्यू देने आया था वह मैनेजर का जानकार था। इस तरह की नजरअंदाजी लगभग हर जगह मौजूद है। पीएचडी की तैयारी कर रहे एक शख्स का कहना है रीटन तो क्लियर हो जाता है, इंटरव्यू में फिर वहीं बात आ जाती है, जिसकी चलती उसकी क्या गलती और यही टैलेंट पीछे हो जाता है और नेपोटिज्म की शरण वाला आगे बढ़ जाता है।

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नेपोटिज्म की जड़े बहुत मजबूत है

नेपोटिज्म को सिर्फ भाई-भतीजावाद तक ही नहीं सीमित रखा जा सकता है। यह तो क्षेत्रवाद, भाषावाद, जातिवाद के अलग-अलग स्तर पर टैलेंट को नकार रहा है। कुछ दिन पहले, माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के एडजंक्ट प्रोफेसर दिलीप मंडल ने अपने ट्विटर पर लिखा था  “सुप्रीम के पूर्व वकील मार्कटेय काटजू के दादा स्वयं गर्वनर थे, पिता इलाहाबाद हाईकोर्ट में जज थे, और काटजू  स्वयं सुप्रीम कोर्ट में वकील है। यह सब कॉलोजियम सिस्टम की देन है”. इसका मतलब यह नहीं है उनमें टैलेंट नहीं है ब्लकि एक ही परिवार के लोग एक सीट पर काबिज हुए हैं। इसके अलावा भी बड़े संस्थानों में ऐसे कई एक उदाहरण मिल जाएंगे। जहां परिवार के लोगों को आगे बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। कहीं उच्च अधिकारी की कुर्सी पर बैठकर भांजे को परमामेंट प्रोफेसर बनाया जा रहा है तो कहीं पति की नौकरी पक्की कराई जा रही है। कुछ दिन पहले सोशल साइट पर एक पोस्ट बहुत तेजी से वायरल हो रही थी कि बीएचयू में सभी ऊंचे पोस्ट पर किसी एक जाति विशेष के लोग ही काबिज हैं।

क्या यह खत्म हो पाएगा

नेपोटिज्म पूरी तरह से खत्म हो पाएगा यह कहना बड़ा मुश्किल है। सामजिक तौर पर देखा जाए तो हर कोई चाहता है कि उसके घर के लोग आगे बढ़ें।  इसलिए बहुत सारे घरों में यह चर्चा भी चलती है बस कोई एक बड़े पोस्ट पर पहुंच जाएं। पूरे घर का उद्धार हो जाएगा। यह दर्शाता है कि नेपोटिज्म का कीड़ा हमारे दिमाग में शुरु से ही भर दिया जाता है। लेकिन वही बच्चा जब टैलेंट के आधार पर उस सीट को नहीं ले पाता है तो हमें यह सारी चीजें यादें आती है। यह बहुत बड़ा सामाजिक सिस्टम है जिसे एकदिन में बदल पाना संभव नहीं है।

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