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क्या हर प्रतियोगिता में जीतना ज़रूरी हैं?

प्रतियोगिता में जीतना, हारना या सीखना- क्या है ज़रूरी


आज के इस दौर में हर चीज़ एक प्रतियोगिता बन के रह गयी है। खेल से लेकर पढाई तक, और पढाई से लेकर कार्य तक, हर क्षेत्र में एक लग ही स्पर्धा होती है। आपको पता भी नहीं लगता और आप भी इस स्पर्धा का हिस्सा बन जाते है। खुद को साबित करने की इस दौड़ में, हम हमारी काबिलियत और हमारी रुचियों को कुचलते हुए, बस भागते चले जाते है। अफ़सोस की बात तो ये है कि, हर कोई इस प्रतियोगिता में जितना चाहता। उसको जीत के अलावा कुछ और दिखता ही नहीं है। लेकिन क्या हर प्रतियोगिता में जीतना ज़रूरी है?

हर किसी की काबिलियत अलग होती है

ये स्पर्धा सिर्फ शिक्षा या कार्य क्षेत्र में नहीं है, ये तो अब हमारी जीवन शैली का भी हिस्सा बन गए है। हर कार्य, हर छोटी- बड़ी चीज़ दुसरो से बहतर होनी चाहिए। और ये हर प्रतियोगिता, जो अपने आप ही शुरू हो जाती है, इस को जीतने का दबाव पूरे परिवार पर होता है। शिक्षा के लिए बच्चो को समझाया जाता है, की उनको पड़ोस में रह रहे शर्मा जी के बेटे से ज़्यादा नंबर लाने है। कार्य क्षेत्र में अपने ही सहकर्मी से बेहतर काम करने की होड़ होती है। बॉस से प्रंशसा और बेहतर तनख्वा के लिए, लोगो को ये भी करना पड़ता है।

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और अगर जीवन शैली की बात करे, तो सुंदर घर, बड़ी गाडी और अच्छे कपड़े- ये सब चीज़े हम दुसरो के लिए ही तो करते है। जाने अनजाने में, हम इस दौड़ का हिस्सा बन गए। और अब आँखे मूँद कर बस भागे जा रहे है, आगे ही बढ़ते जा रहे है। ना ये देखा की पीछे क्या छोड़ आए और ना ही ये देख रहे है कि आगे क्या है। हम क्या खो रहे है और हमे क्या मिल रहा है, इसके बारे में तो हमे कुछ पता भी नहीं है। हम अपने लिए नहीं, पर दुसरो को दिखाने और इस बेमतलब की स्पर्धा का हिस्सा बने रहने के लिए ये ज़िंदगी जिए जा रहे है।

ज़िंदगी कोई प्रतियोगिता नहीं है

ये प्रतियोगिता, चाहे असल में हो या इस ज़िन्दगी की ही, बस एक प्रतियोगिता ही है। इसमें हार जीत से कोई फर्क नहीं पड़ता। और अगर सही मायनों में देखा जाए तो हार और जीत जैसी चीज़े सिर्फ नाम की है। एक बार जीत हासिल करने के बाद ऐसा नहीं होता की वो व्यक्ति महान बन जाता है। उससे बेहतर ना जाने कितने लोग होंगे। और हर हारा हुआ व्यक्ति, असलियत में हारता नही है। वो खुद को बेहतर बनाने के लिए, दुसरो से बहुत सी सीख लेता है। तो किसी की हार और जीत का फैसला करना बहुत मुश्किल होता है।

आप दो लोगो की काबिलियत की तुलना कभी नही कर सकते। और जहाँ बात रही इस अनजान और गैर मौजूद प्रतियोगिता की तो इस में हार जीत के बारे में तो सोचा ही नहीं जा सकता। हर व्यक्ति एक अलग इंसान है। उसका कर्म और उसकी काबिलियत की तुलना किसी और व्यक्ति से नहीं कर सकते। हर किसी की आर्थिक व मानसिक स्तिथि एक समान नहीं होती है। एक चीज़ जो दो अलग अलग स्तर पर है, उनको एक बराबरी पर रख कर नहीं तोल सकते। प्रतियोगिता में जितना ज़रूरी नहीं है। उसका हिस्सा बन कर, उससे सीखना ज़रूरी है।

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