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Movie Review- Sadak 2, अंधविश्वास धर्मगुरु और पारिवारिक कलह की सड़क पर घुमती सड़क 2

पहला एक घंटा बहुत ही स्लो , बीच में ही छोड़ने की इच्छा हो सकती है

फिल्म सड़क2 डिज्नी हॉटस्टार पर रिलीज हो चुकी है. रिलीज से पहले फिल्म ने खूब सुर्खियां बटोरी है. इसका ट्रेलर रिलीज होते है लोगों ने जमकर डिस्लाइक किया था. अब फिल्म को भी लोग बॉयकॉट कर रहे हैं. बॉयकॉट का सिलसिला इतना तगड़ा है कि आईएमबीडी ने अपने रेकिंग में इसे 1 स्टार दिया है. इसके साथ ही एक लंबे समय के बाद महेश भट्ट ने डायरेक्शन में वापसी की है.

फिल्म में आलिया भट्ट, संजय दत्त, आदित्य रॉय कपूर मुख्य किरदार में नजर आ रहे हैं. वही दूसरी ओर पूजा भट्ट छोटे रोल के साथ-साथ फोटो मे ज्यादा नजर आ रही है. यह 90 की दशक की फिल्म सड़क का सीक्वल है. जिसको आज के हिसाब से दिखाने की कोशिश की गई है.

फिल्म की कहानी अंधविश्वास, धर्मगुरु, पैसे के इर्द-गिर्द घूम रही है. जिसमें आर्या एक डोगी बाबा का पर्दाफाश करना चाहती है. वह अपनी मां की मौत का बदला लेना चाहती है. जिसमें उसे लगता है कि उसकी मासी ने बाबा के संपर्क में आकर उसकी मां को मार दिया है. लेकिन उसकी मां का हथियारा कोई और हैं.

बदला लेने में आर्या (आलिया भट्ट) का साथ रवि(संजय दत्त) देता है. जो पहले अपनी जिदंगी में बहुत दुखी रहता है और बार-बार अपनी जान लेनी की कोशिश करता है. लेकिन अंत में 90 के हीरो की तरह अकेले ही धर्म के नाम पर चलाएं जा रहे  अंधविश्वास और बिजनेस के मुख्य आरोपियों का खात्मा कर देता है.

पूरी फिल्म में सभी आर्या की जान के पीछे पड़े रहते हैं. यहां तक की उसका ब्यॉयफ्रेंड (आदित्य रॉय कपूर) भी, पहले वह बाबा (मरकंद देशपांडे) का भक्त रहता है. फिल्म के आधे हिस्से में वह नेगेटिव रोल में नजर आएगा और आधे में अच्छा प्रेमी जो अंत तक उसका साथ देता है.

फिल्म में एक समाज की सच्चाई को पर्दे पर दिखाने की कोशिश की गई. अंधविश्वास के दम पर इन धर्मगुरुओं का बिजनेस कैसे चल रहा है. इनके संपर्क में अच्छे-अच्छे लोग है. जैसे कुछ समय पहले तक मीडिया में ऐसे कई धर्मगुरुओं का जिक्र हुआ था और उनका संपर्क भी अच्छे ओदे वाले लोगों से था.

फिल्म का डायरेक्शन अच्छा है. पहाड़ वादियां नजर आने वाली है. सड़क पर चलती गाड़ी है. जो आपको पहाड़ की घुमावदार सड़कों का दर्शन करवाएंगी. संगीत की बात करे तो ठीक है. डॉयलॉग अच्छे हैं.

अंत में फिल्म का पहला एक घंटा बहुत धीमा है. जहां हो सकता है आप फिल्म न देखने का मन बना लें. फिर धीरे से इसकी गाड़ी हाईवे पर चढ़ना शुरु करती है. जहां आगे की कहानी बाबा से हटकर पारिवारिक कलह पर पहुंच जाती है. पूरी कहानी देखी जाएं तो क्या दिखाना चाह रही है यह समझना थोड़ा मुश्किल है. कब अंधविश्वास के खिलाफ चलाई गई मुहिम पारिवारिक कलह बन जाएगी यह सड़क आपको सही से नहीं बता पाएगी.

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