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Birthday Special: लालू के राह पर चलकर क्या आरजेडी अपनी वापसी कर पाएगी? 

लालू प्रसाद को मिल रही हैं Twitter पर जन्मदिन की बधाई – ‘वंचितों का मसीहा’


देश के नामी राजनीतिज्ञ बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव का आज जन्मदिन है. लालू आज 72 वर्ष के हो गए हैं. इस वक्त वह रांची के जेल में चारा घोटाला के मामले में सजा काट रहे हैं. आज ट्विटर पर ट्विटर ट्रेंड के साथ-साथ लोगों ने खूब बधाई दी है. कोई उनके फनी वीडियो शेयर कर रहा है तो कोई वंचितों का मसीहा कह कर शुभकामनाएं दे रहा है. इससे पहले तेजस्वी यादव ने कल ऐलान किया था कि इस बार वह अपने पिता जी के जन्मदिन पर न तो केक कांटेगे और न ही किसी प्रकार की मोमबती जलाएंगे. ब्लकि इसके इत्तर प्रदेश के 72 हजार लोगों को खाना खिलाएंगे.

लालू के जीवन के शुरुआती दिन

आज भले ही घोटाले के मामले में लालू जेल में बंद है. लेकिन उन्होंने अपने राजनीतिक करियर के शुरुआती दिनों में भी जेल का रास्ता नापा था. इमरजेंसी के समय जब सभी लोगों को जेलों मे डाल दिया गया था. उस वक्त लालू भी जेल गए . इसके साथ ही जेपी आंदोलन के प्रमुख चेहरा थे. जिन्होंने तत्कालिक प्रधानंत्री इंदिरा गांधी का पुरजोर विरोध किया. इसके बाद से ही इनके करियर में उछाल आया. लालू देखते ही देखते 1977 के चुनाव में जनता दल पार्टी की तरफ से छपरा के उम्मीदवार घोषित हुए. इनके प्रचार के लिए राष्ट्रपति आएं.  इसके बाद तो वह लगातार आगे बढ़ते रहे कभी पक्ष तो विपक्ष के नेता के रुप में. 1990 में पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने. लगातार 15 साल राज किया. लेकिन बीच में चारा घोटाला उजागर होने के बाद उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और अपनी पत्नी रावड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया. इसी कालखंड को बिहार की राजनीति का जंगलराज कहा जाता है.

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आज के दौर में आरजेडी की स्थिति

बिहार में इस साल के अंत तक विधानसभा चुनाव होने वाले है. देखने वाली बात यह है कि क्या चुनाव में आरजेडी कुछ कमाल कर पाएगी. इससे पहले 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में अपना खाता भी खोल नहीं पाएं थे. 1997 में जनता दल से अलग होकर लालू ने राष्ट्रीय जनता दल पार्टी बनाई थी. जिस वक्त यह पार्टी बनाई गई थी. उस वक्त तक लालू शोषितों और वंचितों पर अपनी अच्छी पकड़ बना चुके थे. लोगों के बीच यह विश्वास बन गया था कि यही हमें इंसाफ दिला सकते हैं. लालू की राजनीति भी मुख्यतः इसी आधार पर थी. उन्होंने शुरु से ही पिछड़ी जातियों के हक की लड़ाई लड़ी.  1991 के मंडल कमीशन में भी लालू का अहम रोल था. बिहार के गोपालगंज में एक चरवाहे के घर में पैदा हुए लालू ने दूर तक का सफर पूरा किया है. हमेशा जमीन से जुड़े रहे. उनके बारे में कहा जाता है कि कई बार हेलीकॉप्टर से उतरकर लोगों मिलने चले जाते थे. लोगों से सीधा संवाद करते थे. लालू की आत्मकथा “गोपालगंज से रायसीना, मेरी राजनीतिक यात्रा” में इसका जिक्र किया है. देश में जातिवाद जब चरम पर थी तो लालू शोषितों और वंचितों का मसीहा बनकर आएं. यही एक कारण है कि बिहार का बड़ा हिस्सा इनका वोट बैंक बना रहा. लेकिन अब यह नेतृत्व आरजेडी में देखने को नहीं मिलता है. जातियों के वोट धीरे-धीरे दूसरी पार्टियों की तरफ खिसकते चले गए हैं. इस वक्त आरजेडी की कमान तेजस्वी यादव की हाथों मे है. देखने वाली बात यह है कि आने वाले चुनाव में अपने पिता की तरह जमीन पर उतकर लोगों के संवाद करेंगे. उनकी परेशानियों को जान पाएंगे. प्रवासी मजदूरों की एक बडी आबादी अभी बिहार आई है. इनमें से ज्यादातर लोग ट्विटर नहीं चलाते होंगे. क्या ऐसा वक्त में आरजेडी दोबारा लालू के रास्ते पर चलकर अपनी साख बचा पाएगी?

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