पॉलिटिक्स

कालिख पुल की जंगल से लकडियां लाने से लेकर आत्महत्या करने तक का सफर

अरुणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कालिखो पुल ने मंगलवार को अपने घर में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। मौत के पीछे का सबसे बड़ा कारण उनका डेपरेशन बताया जा रहा है। कुछ दिन पहले ही हिंदी न्यूज चैनल में दिए इंटरव्यूय में उन्होंने बताया था वो अपनी जिदंगी में बहुत परेशान है। जिसके कारण वह किसी से मिल भी नहीं रहे है। सिर्फ साढ़े चार महीने तक अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे कालिखो पुल का जीवन संघर्ष पूर्ण रहा है। एक आम इंसान से राज्य के मुख्यमंत्री बनने तक उनके जीवन में कई उतार-चढाव आए।

आईये कालिख पुल के जीवन के संघर्ष के बारे में जानते हैं

कालिखो के नाम का मतलब ही है ‘बेहतर कल’ जैसा कि नाम में ही बेहतर कल का जिक्र है। वैसे ही उनका भविष्य बहुत बेहतर रहा। लेकिन उसका अंत बहुत ही दर्दनाक रहा। एक चौकीदार से मुख्यमंत्री बनने तक उनके जीवन में कई परेशानियां आई। लेकिन इन सब को दरकिनार करते हुए कालिख ने उस मुकाम को हासिल किया जिसे वह पाना चाहते थे।

पैदा होने के बाद से ही उनकी जिदंगी में तो जैसे दुख लिख दिए गए थे। उनके पैदा होने के महज 13 महीने के बाद ही उनकी मां उन्हें छोड़ चल बसी और पांच साल की नन्ही उम्र में पिता ने भी दुनिया को अलविदा कह दिया। इसके बाद से ही उनकी जिदंगी में संघर्ष का दौर शुरु हो गया।

अरुणाचल प्रदेश के हवाई क्षेत्र के वाला गांव में पैदा हुए कालिख कभी-कभी स्कूल जा पाते थे, क्योंकि उन्हें अपनी आंटी को जंगल से लकडियां लाकर देनी होती थी। ऐसे ही उनकी जिदंगी की दिन कटे महीने और कई साल पार हो गए। दस साल की उम्र में उन्होंने दो साल के लिए कारपेंटर की ट्रेनिंग शुरु की। जहां उन्हें महज 1.50 रुपए रोज के मिलते थे। इसके बाद इसी दुकान पर ट्रेनिंग करवाने लगी। इसी दौरान उनकी दुकान पर कई बड़े अधिकारी और राजनेता सामान लेने के लिए आने लगे। जिनके पास कालिख ने अपनी पढ़ने की इच्छा जाहिर की। बस इसके बाद उन्होंने एक नाइट स्कूल में एडमिशन करवा।

khalikho pul

कालिख पुल

एक दिन उनकी जिदंगी में एक छोटा सा बदलाव आया। स्कूल के एक प्रोग्राम के दौरान राज्य शिक्षा मंत्री और कई बडी हस्तियों ने हिस्सा लिया था। इसी दौरान कालिख ने हिंदी में एक स्पीच दी और एक देशभक्ति गीत गाया। जिसके बाद नेता जी खुश हो गए और जल्द ही कालिख को दिन वाले स्कूल में एडमिशन करने कहा और यहां से ही उन्हें चौकीदार की नौकरी मिल गई।

लेकिन यहीं उनकी जिदंगी की परेशानी खत्म नहीं हो गई। कुछ समय बाद उन्हें एक बीमारी हो गई जिसका इलाज करवाने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे। किसी रिश्तेदार ने भी उनकी मदद नहीं की। जिदंगी से तंग आकर लोहित नदी के रेलवे ट्रैक पर जाकर जान देने की कोशिश की लेकिन भीड़ होने के कारण नहीं दे पाए।

इन सबके बाद उन्होनें राजनीति में कदम रखा और साल 1995, 1999, 2004, 2009, 2014 में हाय्लुंइंग से विधायक बने।

कालिख ने साल 2105 में कांग्रेस से बगावत करने के बाद खूब सुर्खियां बटोरियां। साल 2015 में कांग्रेस के 47 विधायकों में से 21 ने बगावत कर नबाम टुकी को गद्दी से हटवा दिया था। जिसके बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लग गया था।

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