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तमाम फैशनबाजी के बावजूद हिंदी से सर्वश्रेष्ठ संवाद का विकल्प नहीं मिल पाया- शोधार्थी

हिंदी का स्वरुप बदला है अंतरात्मा नहीं


हिंदी दिवस प्रत्येक साल 14 सितंबर को मनाया जाता है. और यही एकदिन होता है जब हम पूरी जद्दोजहद के साथ हिंदी को सम्मान देने की कोशिश करते हैं. उसके बाद पूरे साल हम इस सम्मान की जगह कहीं और ही खो जाते हैं.  

आज की 21वीं सदी में हिंदी में कितना बदलाव आया है. हिंदी की शब्दावली में अंग्रेजी की प्रवेश कितना हो गया है. यह सब जानने के लिए हमने हिंदी के कुछ शोधार्थियों से बात करने की कोशिश की है. देश के अलग-अलग विश्वविद्यालयों से शोधार्थियों ने अपने विचारों को प्रस्तुत किया है. आइये उस बदलाव के बारे में जानें.

1. आज की युवा पीढ़ी ‘हिंदी’ शब्द सुनते ही माथे पर ऐसे सिकन लाती है मानो तीसरी दुनिया का शब्द सुन लिया हो. जैसे फ्रेंच, स्पैनिश, डच, चाइनीज़ एक भाषा है वैसे ही हिंदी भी एक भाषा है. एक ऐसी भाषा जो आपको हर जगत से सुलभता से जोड़ देती है. तमाम फैशनबाज़ी के बावजूद आज भी सुविधापूर्ण संवाद के लिए हिंदी से सर्वश्रेष्ठ भाषा का विकल्प नहीं मिल पाया है फिर भी यह स्वयं के वज़ूद के लिए बार बार उपेक्षित हो जा रही है. जहाँ ये अनिवार्य होनी चाहिए वहाँ यह विकल्प बनती जा रही है. हमें हिंदी भाषा पर शर्म नहीं बल्कि गर्व महसूस करना चाहिए.

मेघा शोधार्थी,हिंदी विभाग जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली  

2. हिंदी भाषा की बात आते ही हमारे मन में आज भी राजभाषा और राष्ट्रभाषा के सवाल अनायास कौंधने लगते हैं. लेकिन इससे ज्यादा जरूरी मुद्दा अब यह हो गया है कि हिंदी भाषा का स्वरूप कैसा होगा? यह इसलिए भी जरूरी है कि तकनीकी के दबाव ने भाषिक संरचना और उसके व्याकरणको आंशिक रूप से महत्वहीन बना दिया है. फेसबूक, ट्वीटर जैसे माध्यमों के प्रयोग से यह प्रवृत्ति बलवती हुई है. साहित्य के क्षेत्र में ‘नई वाली हिंदी’ ने एक मजबूत पाठक वर्ग तैयार किया है. हिंदी के इस नए रूप में अभिव्यक्ति पर सर्वाधिक बल दिया गया है,शास्त्रीयता पर कम. हिंदी में होने वाले इस परिवर्तन को कुछ विद्वान गलत मानते हैं जबकि कुछ उसका स्वागत करते हैं. युवा पीढ़ी में इस बदली हुई भाषा का जबरदस्त प्रभाव देखा जा सकता है. इसमें कोई संदेह नहीं कि यह बदलाव युग की मांग है. इससे भाषा के समावेशी रूप का विकास होगा. 

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आलोक कुमार पांडेय, शोधार्थी हिंदी विभाग, महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा

3. आधुनिकीकरण की हिंदी में बदलाव आया है. लेकिन उसकी अंतरात्मा आज भी वही  रुप धारण किए हुए है. हिंदी में बदलाव ज्यादातर हिंदी क्षेत्रों में  ही आया है. हिंदी  से इत्तर क्षेत्र आज भी हिंदी को उसके मूल में ही देखते हैं. हिंदी केवल प्रभावित ही नहीं रही, ब्लकि आधुनिकता के दौर में अपने आपको बदलकर नए रुप में ढल रही है. जिसमें अगर उसके बाद शब्द कम थे तो नए इज्म, वाद के आधार पर नए शब्द शामिल भी हो रहे हैं. हिंदी को उसकी बोलियों और लोक बोलियों के कारण ज्यादा जाना जाता है. जिसका प्रभाव हिंदी क्षेत्रों के ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में बराबर है. 

मनीष कुमार, शोधार्थी हिंदी विभाग, विश्व भारती विश्वविद्यालय, शांतिनिकेतन, पश्चिम बंगाल

4. हिंदी भाषा कई माइनों में कुछेक वर्षों मे कई हद तक  बदल गई है. जिसमें अगर हम देखें तो प्रशासनिक भाषा ही केवल हिंदी के प्रगाढ़  शब्दों से सराबोर है वरना  प्रशासनिक क्षेत्र के बाहर निकलते ही हिंदी लुप्तप्राय हो जाती है. जिसमें हिंदी के अंदर ही कई अनेक भाषाओं ने जगह बना ली है. उन शब्दों को दैनिक जीवन में हम पूरी तरह से उतार चुके हैं. जिसमें ना चाहकर भी हम बाहर नहीं निकल सकते. हिंदी जीविकोपर्जन बनाने वाले मानव भी बाहरी शब्दों के जाल में पूरी तरह फंस गए हैं. वह चाहकर भी इस जाल से नहीं निकल सकते. दिल्ली एनसीआर के बॉर्डर पर अनेक किस्म-किस्म की हिंदी सुनाई देती थी. लेकिन अब अन्य भाषाओं के शब्दों ने अपनी जगह बना ली है. तो हिंदी अपनी मूल समापन की अंतिम छोर पर खडी है. बचाने के लिए हिंदी क्षेत्रों के जन सामान्य को आगे आकर हिंदी के मूल को फिर से खड़ा करने की आवश्यकता है. 

राज कुमार, शोधार्थी हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली

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