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कैसे 25 साल की आर्ची सेन रोजाना करती है 200 कुत्तों की मदद : वीडियो देख हो जायेंगे आप ‘Inspire’

जाने कौन है आर्ची सेन जो मदद करती है आवारा कुत्तों की


आर्ची सिंह रांची की रहने वाली है जिनकी उम्र महज 25 साल है। आपको बता दे कि रांची की रहने वाली आर्ची सिंह पिछले साल से ही सड़क के आवारा कुत्तों को खाना खिला रही हैं। सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रही आर्ची सिंह रोजाना करीब 200 कुत्तों को खाना खिलाती है। आपको बता दे कि आर्ची सिंह का ये सिलसिला पिछले साल से ही चल रहा है। जब से हमारे देश में लॉकडाउन लगा है जब से ही आर्ची सिंह ना केवल इस बात का ध्यान रखती हैं कि कोई भी कुत्ता भूखा ना रहे बल्कि आर्ची इनके वैक्सीनेशन और इलाज का भी पूरा ध्यान रखती हैं। आर्ची ने एक मीडिया इंटरव्यू के दौरान बताया था कि उनका ये सिलसिला दो तीन कुत्तों से शुरू हुआ था जो की आज 200 तक पहुंच चुका है। सिर्फ कुत्तों के खाने का ही नहीं बल्कि उनके पानी का भी इंतजाम आर्ची ने अलग-अलग जगहों पर किया हुआ है उन्होंने 50 पानी के बर्तनों का इंतजाम कर उन्हें अलग अलग जगहों पर कुत्तों के लिए रखा है।

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जाने क्यों आर्ची सेन सड़क के आवारा कुत्तों को लगाए रिफ्लेक्टिव कॉलर बेल्ट

आपको बता दे कि आर्ची सेन सड़क के आवारा कुत्तों को खाना खिलने के साथ साथ उनके लिए ऐसे रिफ्लेक्टिव कॉलर बेल्ट का भी इंतजाम करती है जो की रात के अंधेरे में रिफ्लेक्टिव होते है। जिनके कारण कोई भी आवारा कुत्ता रात को किसी भी सड़क दुर्घटना का शिकार न हो सकें। ये रिफ्लेक्टिव कॉलर बेल्ट सड़क के आवारा कुत्तों को सड़क दुर्घटना से बचने में मदद करती है। अपने भी देखा होगा कि रात के अंधेरे में कई कुत्ते गाड़ी के नीचे आकर दब जाते हैं जिसके कारण उनकी मौत हो जाती है। उन सभी चीजों को देखते हुए ही आर्ची सिंह ने ये नेक काम शुरू किया है। उन्होंने अभी तक करीब 150 कुत्तों को इस तरह के रिफ्लेक्टिव कॉलर बेल्ट लगा दिए हैं।

आपको बता दे कि आर्ची सेन  का कहना है कि सड़क के आवारा कुत्तों का गुजरा सड़क पर पड़े खाने को खाकर ही होता था लेकिन जब से हमारे देश में लॉकडाउन लगा है जब से ही सड़कों पर सन्नाटा पसरा हुआ है जिसके कारण कुत्तों के खाने में भी कमी आ गयी है। आपको बता दे कि आर्ची ने पहले तो कुत्तों को चार पैकेट बिस्कुट लेकर खिलाए। लेकिन वो तुरंत ही खत्म हो गया। उसके बाद आर्ची और ज्यादा बिस्कुट के पैकेट लाने लगीं। लेकिन इतने ज्यादा बिस्कुट के पैकेट भी तुरंत ही खत्म हो जाते थे। जिसके बाद आर्ची ने सड़क के आवारा कुत्तों को खाना खिलाना शुरू किया। लेकिन वो ये काम ज्यादा दिनों एक नहीं कर पाए। क्योंकि इसके लिए उन्हें बहुत सारे पैसों की जरूरत थी। इसके लिए उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पेज बनाया ‘स्ट्रीट डॉग फॉर रांची’ जिसमे उन्होंने लोगों इस दान देने की अपील की थी। जिसमे बहुत सारे लोगों ने उनकी मदद की।  सहायता से अब वो इस समय पर 200 से ज्यादा कुत्तों को रोजाना खाना खिलाने का काम कर पा रही है।

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अगर आपके साथ घरेलू हिंसा हो रही है तो जाने कानून और क्या हो सकती है सजा

जाने घरेलू हिंसा को लेकर कानून क्या कहता है


जैसे की आपने देखा होगा कई घरों में छोटी छोटी बातों पर लड़ाई होने लगती है। घरों में होने वाली इस लड़ाई को ही घरेलू हिंसा कहते है। आपको बता दे कि इस घरेलू हिंसा का शिकार महिलाएं और पुरुष दोनों ही होते हैं लेकिन आमतौर पर देखा जाता है कि ज्यादातर इस घरेलू हिंसा का शिकार महिलाओं को ही होना पड़ता है। इसलिए हमारे देश में समय समय पर घरेलू हिंसा को रोकने के लिए अलग-अलग कानून बनाए गए और उन्हें पारित किया गया है। तो चलिए आज उन कानून और उसमे मिलने वाली सजा के बारे में विस्तार से जानते है।

जाने कौन कौन सी बातें घरेलू हिंसा के दायरे में आती है

तो चलिए सबसे पहले आपको बताते है कि आखिर घरेलू हिंसा क्या है और कौन कौन सी बातें घरेलू हिंसा के दायरे में आती है। घरेलू हिंसा यानी की कोई भी ऐसा काम, जो किसी महिला और 18 साल से कम उम्र के बच्चे फिर चाहे वो लड़का हो या लड़की के स्वास्थ्य, सुरक्षा, जीवन पर मुश्किल लाता हो उसे घरेलू हिंसा ही कहा जाता है। घरेलू हिंसा में मारपीट से लेकर मानसिक नुकसान और आर्थिक क्षति तक को शामिल किया गया है।

इतना ही नहीं घरेलू हिंसा में तलाकशुदा महिलाओं को भी शामिल किया गया है। उन्हें उनके पूर्व पतियों से सुरक्षा प्रदान करने के इरादे से इससे शामिल किया गया है। अक्सर ऐसा देखा जाता है कि तलाक के बाद पूर्व पति या उसके परिवार के लोग महिला और उसके घर वालों को कई तरह की धमकियां देते हैं और परेशान करते है। या फिर महिला की छवि को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते हैं। ये सारी बातें घरेलू हिंसा के दायरे में आती है।

और पढ़ें:फुटबॉल से ईट के भट्ठे तक का सफर : अंतर्राष्ट्रीय फुटबॉलर संगीता नहीं चाहती उनका ‘सपना’ रह जाए अधूरा

जाने घरेलू हिंसा की श्रेणियों के बारे में

शारीरिक हिंसा: घरेलू हिंसा की श्रेणी में शारीरिक हिंसा सबसे गंभीर समस्या है जो की सबसे ज्यादा आम भी है। किसी भी महिला  या फिर 18 साल से कम उम्र के बच्चे फिर चाहे वो लड़का हो या लड़की के साथ मारपीट, धक्का, पैर या हाथों से मारना या फिर कोई ऐसा तरीका, जो महिला या फिर बच्चे को शारीरिक तकलीफ दे, उससे इस श्रेणी में शामिल किया गया है।

लैंगिक हिंसा: घरेलू हिंसा की श्रेणी में लैंगिक हिंसा भी एक गंभीर समस्या है इस श्रेणी में किसी भी महिला को अश्लील साहित्य या अश्लील तस्वीरों को देखने के लिए विवश करना,बलात्कार करना, अपमानित करना या उसके साथ दुर्व्यवहार करना आदि चीजे शामिल है।

आर्थिक हिंसा: आर्थिक हिंसा भी घरेलू हिंसा की एक श्रेणी है आर्थिक हिंसा के तहत अगर कोई व्यक्ति किसी महिला से उसके द्वारा कमाए जा रहे पैसे का हिसाब उसकी मर्जी के खिलाफ लेता है या फिर उससे बच्चों की पढ़ाई, खाना-कपड़ा आदि चीजों के लिए परेशान करता है तो वो सजा का पात्र होगा।

मौखिक और भावनात्मक हिंसा: मौखिक और भावनात्मक हिंसा भी घरेलू हिंसा का एक भाग है। कई बार किसी महिला को पता भी नहीं होता कि वो घरेलू हिंसा का शिकार हो रही है लेकिन वो हो जाती है ऐसा तब होता जब कोई व्यक्ति किसी महिला या बच्चे को ताने दे देकर उसका आत्मसम्मान खत्म कर देता है या किसी भी वजह से उसे अपमानित करना या फिर उसके चरित्र पर दोषारोपण लगाना ये सारी चीजे मौखिक और भावनात्मक हिंसा का ही भाग होती है।

जाने कौन कर सकता है शिकायत

आपको बता दे कि घरेलू हिंसा के सभी पहलुओं को देखते हुए ये तय किया गया कि घरेलू हिंसा की शिकायत सिर्फ पीड़िता ही नहीं बल्कि महिला के जानने वाले भी कर सकते हैं। अगर पीड़ित महिला अपने साथ हो रही घरेलू हिंसा की शिकायत करने से डरती है तो उनके पड़ोसी, रिश्तेदार या फिर दोस्त हिंसा की शिकायत दर्ज करवा सकते है। यहाँ तक कि जो लोग उस हिंसा के बारे में सुन चुके हो या देख चुके हो व फिर कोई सामाजिक कार्यकर्ता भी इसकी शिकायत दर्ज करवा सकता है।

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फुटबॉल से ईट के भट्ठे तक का सफर : अंतर्राष्ट्रीय फुटबॉलर संगीता नहीं चाहती उनका ‘सपना’ रह जाए अधूरा

सरकार की लापरवाही के कारण अंतर्राष्ट्रीय फुटबॉलर संगीता ईट भट्ठे पर काम करने को मजबूर…


पिछले एक महीने में झारखंड का नाम दूसरी बार खबरों की सुर्खियों में आ गया है। दोनों में एक ही समानता है वह है फुटबॉल। पिछले महीने रांची से मात्र 28 किलोमीटर दूर स्थित एक गांव की लड़की ने हार्वर्ड यूनिर्वसिटी की परीक्षा पास कर ग्रेजुएशन में एडमिशन पाया। गांव की छोटी गलियों से हार्वर्ड यूनिर्वसिटी की बड़ी-बड़ी बिल्डिंग तक पहुंचने में उसका साथ दिया फुटबॉल ने। लेकिन यही फुटबॉल धनबाद की टुंडी विधानसभा क्षेत्र की संगीता कुमारी सोरेन के लिए इतना लकी साबित नहीं हो पाया। घर की आर्थिक तंगी और सरकारी की बेरुखी के कारण संगीता आज ईंट भट्ठे पर काम करने को मजबूर है। दो वक्त की रोटी के लिए अब फुटबॉल से ज्यादा किसी और चीज पर ध्यान देना पड़ा है। संगीता का स्थिति के बारे में हमने उनसे फोन पर बात की है।  आप भी पढ़े संगीता का एक्सक्लूसिव इंटरव्यू।

प्रश्न- ऐसा देखा जाता है कि फुटबॉल ज्यादातर लड़के खेलते हैं ऐसे में आपने इसमें करियर बनाने का बारे में कैसे सोचा?

उत्तर– देखिए, मैंने खेलने की शुरुआत ही लड़को को देखकर की है। पढ़ाई के दौरान मैंने देखा कि गांव के ही कुछ भैय्या लोग मैदान में फुटबॉल खेला करते थे। इन्हें देखकर मुझे भी खेलने की इच्छा हुई। मैंने खेलना शुरु किया उस वक्त तक मुझे बस किक मारना ही अच्छा लगता था, बाकी इसके बारे में मुझे कुछ नहीं पता था। धीरे-धीरे गांव के ही दो भैय्या लोग ने फुटबॉल गर्ल्स टीम बना दी, यह टीम ज्यादा दिनों तक टिक नहीं पाई। टीम टूटने के साथ ही एक बार फिर मेरे लिए खेलने की समस्या पैदा हो गई। मैंने अपने मन में ठान लिया था कि मैं फुटबॉल खेलूंगी इसलिए धीरे-धीरे करके आगे बढ़ती गई।

प्रश्न- खेल के दौरान जब गांव में प्रैक्टिस बंद हो गई तो आपने क्या किया?

उत्तर– गांव में जैसे ही गर्ल्स टीम टूट गई। मैं पास के गांव में संजय नामक एक सर के पास गई, जो वहां गर्ल्स टीम को फुटबॉल प्रैक्टिस करवाते थे, मैंने उनसे बात की और वहां प्रैक्टिस के लिए जाने लग गई। यहीं से मुझे साल 2016 में क्लब ज्वांइन करवाया गया। इसी दौरान मेरी मुलाकात अभिजीत गांगुली सर से हुई और वही मेरे कोच भी बनें। मैंने भले ही क्लब ज्वांइन कर लिया था, लेकिन आर्थिक स्थिति अभी में मेरे अच्छी नहीं थी। प्रैक्टिस करने के लिए मुझे 8 से 9 किलोमीटर दूर बिरसा मुंडा स्टेडियम जाना होता था। इस दौरान कभी-कभी मेरे पास ऑटो का भाड़ा भी नहीं होता था तो मैं पैदल ही प्रैक्टिस के लिए निकल जाती थी। कई  बार मेरे कोच ने भी मेरे आर्थिक सहायता की है।

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प्रश्न- आप काम तो कोई और भी कर सकती थी, ईट भट्ठे को ही क्यों चुना?

उत्तर– देखिए काम तो बहुत सारे हैं लेकिन सारे काम मैं नहीं कर सकती हूं। दूसरा कारण यह भी है कि लॉकडाउन के कारण बहुत सारे कामधंधे बंद हैं। मैंने ईट भट्ठे पर काम करना इसलिए चुना क्योंकि यहां काम करते हुए मैं फुटबॉल के साथ भी जुड़ी रह सकती हूं। ईट भट्ठे पर काम करने लिए मैं दोपहर  में आती हूं। यहां आने से पहले सुबह मैं फुटबॉल की प्रैक्टिस कर लेती हूं। इस तरह मेरे दोनों काम हो जाते हैं। अगर मैं कहीं और काम करुंगी तो मुझे सारा दिन वहां काम करना होगा। इस तरह मैं फुटबॉल की प्रैक्टिस नहीं कर पाउंगी। इसलिए मेरे लिए जरुरी है कि मैं फुटबॉल का न छोडूं।

प्रश्न- ईट भट्ठे पर आपको कितनी दिहाड़ी दी जाती है?

उत्तर- ईट भट्ठे में दिहाड़ी की हिसाब से पैसे नहीं मिलते, यहां तो आप जितने ईट ढो लेते हैं उसी हिसाब से पैसे मिल जाते हैं। मैं अपनी जरुरत के हिसाब से काम कर लेती हूं। फिर भी एकदिन में 150 रुपए मिल जाते हैं। इससे मैं परिवार की मदद भी कर देती हूं और फुटबॉल की प्रैक्टिस भी कर लेती हूं।

प्रश्न- सरकार द्वारा मदद की बात कही जा रही है, पिछली बार भी संज्ञान लिया गया था इस बार आपको क्या उम्मीद है सरकार से?

उत्तर– हां मदद की बात तो कही जा रही है, हमारे यहां के बीडीओ मेरे घर में आएं थे, एक महीने का राशन और 10 हजार रुपए देकर गए हैं। बाकी अब कुछ नहीं जा सकता कोई मदद मिलेगी या नहीं। पिछली बार भी मेरे स्थिति पर संज्ञान लिया था। मुझे राज्य सरकार ने नौकरी देने की बात कही गई थी। मैं भी उनके आश्वासन के बाद निश्चित हो गई थी। इसलिए मैंने इस बारे में कुछ ज्यादा इक्वायरी नहीं की। उसके बाद लॉकडाउन हो गया। उसके बाद क्या स्थिति हैं आप स्वयं ही दिखिए। इस बार भी मुझे कुछ खास उम्मीद नहीं दिखाई दे रही है।  

प्रश्न- आपके माता पिता क्या करते हैं?

उत्तर-मेरे माता पिता दोनों ही मजदूरी करते हैं। अब मेरे पापा की आंखे खराब हो गई हैं। हमलोग उनको काम करने से मना करते हैं। लेकिन क्या करें कमाएंगे नहीं तो खाएंगे क्या? घर की आर्थिक स्थिति ठीक रहे इसलिए मैं भी काम कर रही हूं ताकि दाल रोटी चल सके।

प्रश्न- आखिरी सवाल, खबरों के अनुसार आप थाईलैंड और भूटान में मैच खेलने के लिए गई हैं, पहले राष्ट्रीय मैच आपने कब खेला?

उत्तर– मैंने अपना पहला राष्ट्रीय मैच साल 2017 में ओडिशा में खेला था। इसके बाद मैंने कभी पीछे मुढ़कर नहीं देखा। इसके बाद मैं अंडर 18 में भूटान खेलनी गई जिसके लिए मैंने कड़ी मेहनत की, चंडीगंड में मेरा सलेक्शन 40 से 20 लड़कियों के बीच हुआ था। साल 2019 में मैंने सिंगल नेशनल गेम खेला था।

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हर महिला को गाड़ी चलाते वक्त इन बातों का रखना चाहिए विशेष ध्यान

महिलाओं को गाड़ी चलाने से पहले सावधानी के तौर पर इन बातों का रखना चाहिए ध्यान


एक समय था जब हमारे देश में महिलाओं को कुछ भी करने की आजादी नहीं थी। उन्हें अपने अनुसार अपनी जिंदगी जीने नहीं दी जाती थी। लोगों का मानना था कि महिलाएं सिर्फ घर की चार दीवारी तक ही सिमित रहनी चाहिए। उनका काम घर और बच्चों को संभालना होना चाहिए। लेकिन आज समय बदल चुका है आज के समय में महिलाएं अपना घर संभालने के साथ साथ अपना कारोबार भी संभाल रही है। आज ऐसी कोई जगह नहीं है जहां महिलाएं न हो। महिलाएं हर चीज में अपनी भगीदारी देती है। अगर हम महिलाओं के गाड़ी चलाते की बात करें तो जब कोई कोई महिला गाड़ी चलनी सीख लेती हैं तो उसके आधे से ज्यादा काम बेहद आसान हो जाते है। जब कोई महिला टू-व्हीलर चलाने लगी है तो उसकी ज़िन्दगी काफी ज्यादा आसान हो जाती है। लेकिन महिलाओं के लिए ये बहुत जरूरी होता है कि जब भी वो टू-व्हीलर चलाएं तो छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखें। क्योंकि अक्सर यही छोटी-छोटी बातें सड़क दुर्घटनाओं का या फिर अन्य किसी समस्या का कारण बनती है। इस लिए महिलाओं को गाड़ी चलाने से पहले सावधानी के तौर पर इन बातों का ध्यान रखना चाहिए।

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Image Source- Economic Times

हील्स न पहनें: आपने देखा होगा कि ज्यादातर महिलाओं को हील्स पहनने का बहुत ज्यादा शौक होता है। जिसके कारण जब वो टू-व्हीलर से भी जा रही होती है तो भी हील्स पहन लेती हैं। कई बार रास्ते में गाड़ी का संतुलन बिगड़ने पर वह अपना और गाड़ी दोनों का संतुलन नहीं संभाल पाती। जिसके कारण कई बार हमारे लिए बड़ी मुश्किल भी खड़ी हो जाती है इसलिए हमें ध्यान रखना चाहिए कि टू-व्हीलर चलते समय हम हील्स न पहनें।
सही कपड़ों का चयन: जब भी आप टू-व्हीलर चलाए या फिर किसी और के साथ उस पर बैठे, तो एक बार पहले अच्छे से देख लें कि जो कपड़े आपने पहने हैं, वे आरामदायक तो है नहीं?क्योंकि अगर आपके कपड़े आरामदायक नहीं होंगे तो आपका ध्यान बार-बार उनको ठीक करने में लगा रहेगा जिसके कारण कोई दुर्घटना भी हो सकती है। इसलिए आपको उचित कपड़े पहनकर ही गाड़ी चलानी चाहिए।

गाड़ी के दस्तावेज: आप जब भी गाड़ी चलाए उससे पहले गाड़ी से जुड़े सभी दस्तावेज अपने पास रख ले। क्योंकि कई बार देखा जाता है कि महिलाएं घर में किसी अन्य सदस्य की गाड़ी चला रही होती हैं। जिसके कारण उसको गाड़ी से जुड़े दस्तावेज के बारे में सारी जानकारी नहीं होती और अगर कभी रास्ते में पुलिस ने कभी उन्हें रोक लिया और गाड़ी से जुड़े दस्तावेज दिखाने को कहा, जो उसके पास नहीं होते। ऐसे में उनके साथ साथ परिवार के अन्य सदस्य को भी परेशान होना पड़ता है। इसलिए आपको दस्तावेज और उनसे जुड़ी जानकारी अपने पास रखनी चाहिए।

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दीदी तीसरी बार बनी बंगाल की मुख्यमंत्री, जानें देश की महिला मुख्यमंत्रियों के बारे में…

आज तीसरी बार ममता बनर्जी ने ली मुख्यमंत्री पद की शपथ


दीदी यानि की ममता बनर्जी ने बुधवार को तीसरी बार बंगाल के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है। ऐसा ममता बनर्जी के साथ दूसरी बार हो रहा है जब वो विधानसभा की विधायक नहीं होने के बाद भी बंगाल की कमान संभाल रही हैं। शायद आपको याद हो, जब साल 2011 में ममता बनर्जी पहली बार बंगाल की मुख्यमंत्री बनी थीं तो उस समय वो लोकसभा में सांसद थीं। आपको बता दे कि इस बार ममता बनर्जी नंदीग्राम से अपने पुराने सहयोगी और भाजपा उम्मीदवार शुभेंदु अधिकारी से चुनाव हार गई हैं। लेकिन हार के बाद भी ममता बनर्जी बंगाल की मुख्यमंत्री बन सकती हैं। आपको बता दें कि छह महीने के भीतर ममता बनर्जी को  राज्य के किसी भी विधानसभा सीट से चुनाव जीतना होगा। अगर ऐसा नहीं होता तो ममता बनर्जी को अपना मुख्यमंत्री का पद छोड़ना पड़ेगा।

जाने उन महिलाओं के बारे में जो संभाल चुकी है मुख्यमंत्री की कुर्सी

Image Source- Business Standard

ममता बनर्जी: आपको बता दें कि बंगाल की तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने वाली ममता बनर्जी साल 2011 में पहली बार बंगाल की मुख्यमंत्री बनी थी। क्या आपको पता है ममता बनर्जी को अग्नी कन्या कहा जाता है। क्योंकि उन्होंने राजनीतिक जीवन में काफी संघर्ष किया है। शुरू में ममता बनर्जी कांग्रेस पार्टी में थी। लेकिन बाद में उन्होंने अपनी अलग पार्टी का गठन किया और उसका नाम AITMC रखा। इतना ही नहीं बंगाल में ममता दीदी ने 30 साल पुरानी वाम मोर्चा सरकार को हटा कर सत्ता प्राप्त की थी।

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जे जयललिता: आपको बता दे कि जयललिता पहली बार 1991 में तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनी थी। उसके बाद वो कई बार मुख्यमंत्री बनी। उन्हें हमारे देश में एक मजबूत नेता के रूप मे माना जाता था। इतना ही नहीं, उन्हें एम जी रामचंद्रन का उत्तराधिकारी भी माना जाता था। जयललिता एक मजबूत नेता होने के साथ-साथ एक फिल्म अभिनेत्री भी रह चुकी है।

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मायावती: ये बात तो हम सभी लोग जानते है कि मायावती हमारे देश की पहली दलित महिला है जो मुख्यमंत्री बनी। और मायावती बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख है। आपको बता दे कि मायावती कई बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकी है। और मायावती कांशीराम का उत्तराधिकारी माना जाता है।

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सुषमा स्वराज: आपको बता दे कि साल 1998 में पहली बार सुषमा स्वराज दिल्ली की मुख्यमंत्री बनी। इतना ही नहीं, सुषमा स्वाराज बीजेपी की तरफ से भी मुख्यमंत्री बनने वाली पहली महिला थी। लेकिन सुषमा स्वराज बतौर मुख्यमंत्री काफी कम दिनों तक ही रह सकी। क्योकि उस समय देश भर में चल रहे प्याज के संकट के कारण उनकी पार्टी दिल्ली में चुनाव हार गयी।

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शीला दीक्षित: आपको बता दे कि शीला दीक्षित पहली बार 1998 में मुख्यमंत्री बनी। जिसके बाद वो लगातार तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं। आज भी सबसे लम्बे समय तक महिला मुख्यमंत्री बनने का रिकॉड शीला दीक्षित के नाम है वह कांग्रेस पार्टी की नेत्री थी।

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Mother’s Day special: जाने कोरोना महामारी के बीच कैसे मनाएं मदर्स डे

लॉकडाउन के दौरान कुछ ऐसे प्लान करें अपनी माँ के लिए सरप्राइज


जैसा की हम सभी लोग जानते है कि इस समय हमारा पूरा देश कोरोना महामारी से जूझ रहा है। और इस समय देश के कई राज्यों में लॉकडाउन भी लगा हुआ है। इसी बीच मदर्स डे आ रहा है। और लॉकडाउन के कारण न तो आप अपनी माँ को सरप्राइज ट्रैवल टिकिट दे सकते हैं और ना ही कही डिनर पर ले जा सकते है। बल्कि इस बार तो कई लोगों के लिए गिफ्ट देना भी काफी ज्यादा मुश्किल हो गया है एक तरफ तो लॉकडाउन दूसरी तरफ पैसों की किलत। क्योकि इस कोरोना लॉकडाउन के कारण कई लोगों ने अपनी नौकरियां खो दी है। लेकिन इन सबके बीच भी आप अपनी माँ को स्‍पेशल फील करा सकते है। हर साल मदर्स डे मई के दूसरे रविवार को मनाया जाता है। और इस दिन का खासा उत्‍साह पूरी दुनिया में देखने को मिलता है। हमे उम्मीद है कि इस बार भी लॉकडाउन इस उत्‍साह को कम नहीं कर पाएगा। अगर आप अपनी माँ के पास है तो इस बार आप भी उनको स्पेशल फील करने के लिए ये आइडियाज ट्राई कर सकते है।

लंच या डिनर: अगर आप भी उन लोगों में से है जो इस कोरोना महामारी के बीच भी अपने माँ पापा के पास है तो आपके माँ पापा के लिए इससे बड़ा और अच्छा सरप्राइज और गिफ्ट और कुछ हो ही नहीं सकता है। आप चाहो तो मदर्स डे के मौके पर अपनी माँ के लिए घर पर ही उनका पसंदीदा लंच या डिनर बना सकते है। सबसे जरूरी, ऐसे खास मौके पर एक साथ समय बिताना सबसे ज्यादा मायने रखता है।

और पढ़ें: इंग्लैंड में बैंक इंवेस्टर बैंकर रही महुआ मित्रा भारतीय राजनीति का अहम हिस्सा है

ओटीटी: अगर आपकी माँ भी डिजि‍टल दुनिया से सक्रिय नहीं हैं तो इस मदर्स डे आप उनको इस डिजि‍टल दुनिया से सक्रिय करा सकते है। आप उन्हें  किसी भी डिजिटल प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स, ZEE5, अमेज़ॅन प्राइम, हॉटस्टार की कोई शानदार वेब-सीरीज या फिर फिल्म दिखा सकते है। और उनका ये दिन स्पेशल बना सकते है।

केक बनाएं: इस मदर्स डे शेफ की कैप लगाओ और अपनी माँ के लिए स्पेशल केक या मफिन बनाओ। हम में से कई लोग ऐसे भी होते है जिनका अपने पैरेंट्स के लिए कुछ स्‍पेशल करने की इच्‍छा होती है लेकिन समय की कमी के कारण हम कुछ कर नहीं पाते। तो अब मौका है आप अपनी माँ के लिए मदर्स डे पर एक स्पेशल केक या मफिन बना सकते है।

डांस-गाना: आप इस लॉकडाउन का सबसे अच्छा फायदा मदर्स डे मनाने के लिए उठा सकते है। अगर आपकी माँ उन लोगों में से है जिनको डांस-गाना पसंद है तो आप उनके लिए घर में कुछ स्नैक्स बनाएं और डांस-गाने की पार्टी कर लें। और अपनी माँ के साथ डांस करें। और उनके पसंदीदा गाने सुनें और उन्‍हें भी गाने के लिए कहें।

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इंग्लैंड में बैंक इंवेस्टर बैंकर रही महुआ मित्रा भारतीय राजनीति का अहम हिस्सा है

महुआ मोइत्रा ने अमेरिका में पढ़ाई की है


अपने पहले ही भाषण से पूरी संसद को हिला देने वाली तृणमूल सांसद महुआ मोइत्रा की भारतीय राजनीति में एक अलग ही पहचान है। वह अक्सर हर मुद्दे पर सरकार को घेरती हुई नजर आती है।  महुआ पश्चिम बंगाल की कृष्णानगर लोकसभा सीट से सांसद है। एक सामान्य हिंदु परिवार में जन्म लेनी महुआ ने कामयाबी के हर कदम को चुमा है। जिसे उसने कभी अपने सपने में सोचा था। पश्चिम बंगाल में युवा कांग्रेस नेता के तौर पर अपनी राजनीतिक करियर की शुरुआत करने वाली आज भारतीय राजनीति का चमकता सितारा है। जिसे लोग सुनना पसंद करते हैं। तो चलिए आज आपको महुआ मोइत्रा के जीवन के बारे में बताते हैं।

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कंपनी में वाइस प्रेसीडेंट थी

महुआ का जन्म 12 अक्टूबर 1974 को दीपेंद्र लाल मोइत्रा और मंजू मोइत्रा के घर असम के कछार जिले में हुआ था। लेकिन शिक्षा दीक्षा कोलकाता में हुई। कोलकाता से पढ़ाई पूरी करने के बाद वह आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका चली गई। जहां से इन्होंने माउंट होल्योक कॉलेज से मैथ्य और इकोनॉमिक्स में ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की।  यही से शुरु हुआ महुआ का प्रोफेन्सल करियर।  पढ़ाई पूरी करने के बाद वह जे पी मोर्गन चेस, न्यूयॉर्क में इंवेस्टमेंट बैंकर के तौर पर नौकरी करने लगी। जब इन्होंने अपनी नौकरी छोड़ी उस वक्त वह इसी कंपनी में वाइस प्रेसीडेंट की पोस्ट पर तैनात थी।

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कैसे की राजनीति की शुरुआत

महुआ को 18 साल की उम्र से ही राजनीति में आने का शौक था। उनका यह सपना बाद में साल 2009 के बाद पूरा हुआ। जब उन्होंने राजनीति में आने के लिए बैंक की नौकरी को छोड़ दिया। लंदन से भारत वापस आने के बाद महुआ ने सबसे पहले भारतीय युवा कांग्रेस को ज्वांइन किया। वह राहुल गांधी की बहुत ही भरोसेमंद युवा थी। जिन्हें राहल गांधी ने आम आदमी का सिपाही की जिम्मा दिया था। महुआ का राजनीति में आने के पीछे भी एक मजेदार किस्सा है। पढ़ाई पूरी करने के बाद जब वह 10 साल बाद कॉलेज की रीयूनियन पार्टी में गई तो उनके सारे बैचमेट बैंकों में अच्छी जगह पर कार्यरत थे। लेकिन महुआ अपने काम से खुश नहीं थी। उन्होंने उसी वक्त यह निर्धारित किया कि अगले दस साल वह रीयूनियन में मिलेगी तो बैंकर नहीं रहेगी। उन्हें कुछ अलग करना है। इसके बाद ही उन्होंने भारतीय राजनीति में कदम रखा।

राजनीति में धुंधाधार वार

महुआ को लोगों ने पहले बार टीवी तब जाना जब वह ऑनएयर चल रहे प्रोग्राम में अर्नब गोस्वामी को मीडिल फिगर दिखाकर चली गई। इसके बाद तो चारों तरफ इनकी चर्चा होने लगी। महुआ को राजनीतिक रुप से पहचान साल 2019 के 25 जून के भाषण के बाद मिली। जहां उन्होंने केंद्र सरकार को खुल तौर पर फासीवाद कहकर पुकारा था। इसके बाद अगले पांच के लिए महुआ को सुनने के लिए लोग तैयार हो गए। अब तो आलम यह है कि वह हर मुद्दे को संसद में उठाती है। उनका कहना है  कि हम विपक्ष में है इसलिए जनता की आवाज उठाना हमारा काम है। साल 2019 में ही आए नए नागरिक कानून के वक्त भी उन्होंने संसद मे भाजपा को आड़े हाथों लेते हुए। कहा कि ‘भारत किसी के बाप का नहीं है’।

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जानें कर्नाटक की उस मसाला फैक्ट्री के बारे में जहां केवल महिलाओं को मिलता है रोजगार

Only women get employment in this spice factory

इस मसाला फैक्ट्री में सिर्फ महिलाओं को ही मिलता है रोजगार


जैसा कि हम सभी लोग जानते है कि एक समय था जब महिलाओं को घर की चार दीवारी से बाहर जाने की अनुमति नहीं थी लेकिन आज समय काफी हद तक बदल गया है। और आज के समय में महिलएं अपने पैरों पर खड़ी है। वो आज के समय में पूरी तरह आत्मनिर्भर है महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में कई लोगों ने अपना योगदान दिया है आज हम आपको एक ऐसी ही मसाला फैक्ट्री के बारे में बताने जा रहे है जहां सिर्फ महिलाओं को रोजगार मिलता है ताकि महिलाओं की स्थिति सुधर सके। तो चलिए विस्तार से जानते है इस मसाला फैक्ट्री के बारे में।


कहां है ये मसाला फैक्ट्री

ये मसाला फैक्ट्री कर्नाटक के चित्रदुर्ग जिले में स्थित है। यह एक ऐसी मसाला बनाने वाली कंपनी है जिसमें सिर्फ महिलाओं को ही रोजगार मिलता है। 1979 में महिलाओं की स्थिति को देखते हुए लक्क्षम्मा और थिप्पीस्वामी ने इस मसाला बनाने वाली फैक्ट्री की शुरू की थी। आपको जान कर थोड़ी हैरानी होगी की इस मसाला फैक्ट्री की शुरुआत महज 20 हजार रुपये से की गयी थी। इस मसाला फैक्ट्री को शुरू करने का मुख्य उद्देश्य बिजनेस को बढ़ाकर महिलाओं की मदद करना था। इतना ही नहीं इस मसाला फैक्ट्री में कई महिलाओं को काम करते हुए 30 साल से भी ज्यादा समय हो चुका
है।

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जानें क्या मानना है मसाला फैक्ट्री के मालिक का

इस मसाला फैक्ट्री के मालिक का कहना है कि महिलाएं अपने जीवन में बहुत सारे संघर्ष करती हैं। उसके बाद भी उनको कई बार इसका फल नहीं मिल पाता। इसलिए उन्होंने यह निर्णय लिया कि वो सिर्फ महिलाओं को ही अपने वहां काम पर रखेंगे। जिसके बाद उन्होंने पाया कि महिलाएं एक वर्कर के रूप में काफी अच्छी काम कर रहती है। साथ ही साथ उनकी स्किल पुरुषों से ज्यादा अच्छे होते हैं। इतना ही नहीं महिलाएं सामान भी काफी कम बर्बाद करती हैं और सभी चीजों को काफी अच्छी तरह संचालित करती है।

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जानें कौन है मनदीप कौर, जो न्यूजीलैंड में बनी पहली भारतीय मूल की पुलिस सर्जेन्ट

टैक्सी ड्राइवर से ऑफिसर बनने तक का सफर


  आज भारतीय विश्व के हर कोने में अपना परचम लहरा रहे हैं।  इस पंक्ति में महिलाएं भी पीछे नहीं हैं। जहां सुंदर पिचई जैसे पुरुष गूगल के सीईओ बनकर भारत का नाम रोशन कर रहे हैं। वहीं इस कड़ी में महिलाएं भी आगे आ रही हैं। मनदीप कौर भी ऐसी ही एक भारतीय मूल की महिला है जो आज न्यूजीलैंड में भारत का नाम और ऊंचा कर रही है। तो चलिए आज आपको मनदीप कौर के बारे में  बताते हैं।

Image Source- Women economic forum

सीनियर सर्जेन्ट बनी मनदीप कौर

टैक्सी ड्राइवर से पुलिस सर्जेंट बनी मनदीप आज भारत का गर्व है। वह न्यूजीलैंड में भारत की पहली महिला पुलिस सर्जेंट बनी है। इसके लिए उनकी नियुक्ति मार्च महीने में हुई थी।  न्यूजीलैंड की मीडिया के अनुसार 52 वर्षीय मनदीप ने अपने करियर की शुरुआत 17 साल पहले की थी। उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और आज वह कई भारतीय के लिए प्रेरणा का स्त्रोत है। मनदीप के पुलिस सर्जेंट बनने पर न्यूजीलैंड में भारत के उच्चायुक्त मुक्तेश परदेशी ने उन्हें गुरु देव जी की एक किताब तोहफे में दी। आज मनदीप न्यूजीलैंड मे फ्रंन्टलाइन सर्जेंट है। इसके अलावा वह घरेलू हिंसा और जांच में सहायक के तौर पर काम कर रही हैं।  इतना ही नहीं वह लोगों से लगातार मिलती हैं  और उन्हें उनकी परेशानियों के लिए सलाह भी दी हैं। इससे पहले उन्होंने न्यूजीलैंड में पुलिस के लिए भांगड़ा ग्रुप भी बनाया था। जहां वह स्वयं लोगों को भांगड़ा सीखती थी।

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न्यूजीलैंड में पहले टैक्सी चलाई

न्यूजीलैंड में अपने करियर के शुरुआती दौर में मनदीप ने न्यूजीलैंड  में टैक्सी चलाई। इस दौरान उनकी मुलाकात एक शख्स से हुई मनदीप की कद कठी को देखते हुए उन्होंने उन्हें पुलिस में ज्वांइन होने के लिए प्रेरित किया, और यही से शुरु हुआ उनकी जिदंगी में बदलाव का। मनदीप की जिदंगी में उसके धर्म ने अहम रोल अदा किया है। वह गुरुद्वारे में रोज भजन-कीर्तन करने जाया करती थी। लेकिन पुलिस की नौकरी करने के लिए बहुत सी विपरीत परिस्थितियों से होकर गुजरना पड़ता था। क्योंकि वह गुरुद्वारा में भजन गाया करती थी, इसलिए इस नौकरी के लिए उन पर सामजिक प्रेशर भी पड़ रहा था। लेकिन मनदीप के घरवालों इस मुश्किल दौर में उनका खूब साथ दिया।

कौन है मनदीप कौर?

मनदीप मूल रुप से पंजाब के चंडीगड की रहने वाली है। मात्र 18 साल की उम्र में ही उनकी शादी कर दी गई थी। साल 1992 में उनकी यह शादी टूट गई। इसके  बाद शुरु हुई मनदीप की असली परीक्षा, उन्हें अपने साथ-साथ दो बच्चों को भी पालना था। वह 1996 में ऑस्ट्रेलिया  गयी। उस वक्त उनके पास न तो कोई डिग्री थी और न ही उन्हें अंग्रेजी बोलने आती थी। इन दौरान उन्होंने सबसे पहले एक सेल्समैन की जॉब की। उसके बाद 1999 में वह न्यूजीलैंड आई और टैक्सी चलानी लगी और यही से शुरु हुई उनकी जिदंगी की एक और पारी, जहां आज वह कई महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बन गई हैं।

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Dancing Dadi: जानें आखिर कौन है रवि बाला जो डांसिंग दादी के नाम से फेमस हैं.

Dancing Dadi: इंस्टाग्राम पर एक लाख से ज्यादा लोग इन्हें फॉलो करते हैं


अगर आपके अंदर कोई कला है तो आप उसे बहुत दिनों तक छुपा कर रख नहीं सकते हैं। ऐसी ही कहानी है एक 62 वर्षीय महिला की। जिनके लिए उम्र बस एक नंबर है। जिस वक्त लोग अपने घुटनों और कमर के दर्द की बातें बताते हैं। उस वक़्त रवि बाला शर्मा लोगों को अपने डांस से दीवाना बना रही हैं। तो चलिए उम्र के इस पड़ाव में लोगों को दीवाना बनाने वाली रवि बाला (dancing dadi) के बारे में आपको बताते हैं।

इंटरनेट पर डांस दादी के नाम से जानी जाती हैं…

मुंबई में रहने वाली रवि बाला को पहचान इंस्टाग्राम ने दी है। उन्हें लगभग 1 लाख से भी ज्यादा लोग फॉलो कर रहे हैं। इतनी बड़ी संख्या में लोगों का फॉलो करने का सबसे बड़ा कारण है उनका डांस परफॉर्मेस। रवि हर तरह के डांस करती हैं। आप उनकी प्रोफाइल में जाकर देख सकते हैं कि वह क्लासिकल डांस से लेकर पंजाबी भांगड़ा तक हर तरह के मूव्स में वीडियो अपलोड करती है। उम्र के इस पड़ाव में भी रवि थकती नहीं है। वह भांगड़े के सभी स्टेप को आज के गानों के साथ कर रही हैं। आज रवि बाला अपनी इसी कला के कारण डांसिंग दादी के नाम से फेमस हो चुकी है। डांस के साथ-साथ वह तबला भी बजाती हैं। अगर आप उनकी प्रोफाइल को चेक करेंगे तो वह आपको तबला, हारमोनियम बजाते हुए भी नजर आएंगी।

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शादी के बाद गृहस्थी में व्यस्त हो गई थी…

आज के दौर में इंटरनेट किसी भी व्यक्ति को दुबारा से अपने आप को आगे बढ़ने का मौका देता है। ऐसा ही कुछ रवि बाला के साथ हुआ। उन्हें बचपन से ही डांस का बहुत शौक था। वह अक्सर अपने घर वालों को बिना बताएं स्कूल में होने वाले प्रोग्राम में हिस्सा लिया करती थी। बाद में उनकी शादी हो गई और धीरे-धीरे करके वह अपनी गृहस्थी में बिजी हो गई और अपने पैशन से दूर हो गई। लेकिन इस बीच वो अपने पैशन को भूली नहीं और एक बार फिर 62 साल की उम्र में आकर दुबारा से डांसिंग की दुनिया में कदम रख रही हैं। रवि बाला शर्मा का इस तरह का कदम कई महिलाओं के लिए इंस्पीरेशन का काम करता है। जो महिलाएं अपने अंदर की कला को किसी कारणवश छोड़ चुकी है उन्हें रवि बाला की परफॉर्मेंस को देखना चाहिए।

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