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न विकास, न रोजगार, न अच्छे दिन, हे भगवान यह कैसा रामराज्य?

क्या रामराज्य का सपना रह जाएगा अधूरा?


साल 2014 में सत्ता में आने से पहले वर्तमान सत्तारूढ़ सरकार ने ‘रामराज्य’ के तौर पर कई बड़े-बड़े वायदे के किए थे। जिसके तहत देश में कोई बेरोजगारी नहीं होगी , अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं, अच्छी शिक्षा, अच्छी सुरक्षा, और समग्र रूप से भारत की आबादी में सामान्य खुशी और संतोष होगा। रामराज्य की कहानी को बताकर भाजपा ने जनादेश का भरी समर्थन पाया था। लेकिन अफसोस की बात है कि यह जनादेश क्षुद्र स्वार्थों और हिंदू कट्टर वोटबैंक से खिलवाड़ कर रहा था, बिना किसी चिंता की देश पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा। देश की जनता ने इस तरह के वायदों का अनुभव पहले की सरकारों के दौरान भी  किया है। जिसमें राजनीतिक पार्टियों ने बिना जनता की परवाह किए उनके सपनों को तोड़ा है।

प्रत्याशियों का चयन योग्यता के आधार पर नहीं, बल्कि जाति, धर्म के आधार पर होता है

हमारे देश में चुनावों के दौरान  बड़ी पार्टियां अपने उम्मीदवारों का चयन क्षेत्रों के धार्मिक और जातिगत  गणित को देखती हुए करती है। न कि इस मापदंड को रखते हुए कि उस क्षेत्र को बेहतर कौन बना सकता है। इस दौरान हर पार्टी का मकसद सिर्फ यही होता है कि वह चुनाव जीतकर गद्दी को हासिल करें।  इसके अलावा जाति के आधार पर, धार्मिक भावनाओं के आधार पर यहां तक कि कुछ मामलों में, विभिन्न साधनों का उपयोग करके एकतरफा चुनाव जीता जाता है।

 यही कारण है कि चुनाव के दौरान जिन भावनाओं के आधार पर उम्मीदवारों को चुना जाता है। जीतने के बाद वह उसी के अनुसार काम भी करते हैं। जबकि जिन वायदों को चुनाव के दौरान प्रतिनिधियों द्वारा कहा गया था,  वह उसे गंभीरता से नहीं लेते हैं । उनकी पार्टी के घोषणापत्रों में निहित ये चुनावी वायदे बिना किसी नैतिक या कानूनी बाध्यता के एक चुनाव से दूसरे चुनाव में बदल दिए जाते हैं।

बाकी कामों के लिए सजा का प्रावधान है, घोषणापत्र को पूरा नहीं करने पर क्यों नहीं?

परिप्रेक्ष्य में, शेयरों को बेचने के लिए बाजारों में आने के समय को कंपनियां उन्हें जारी करती हैं जिसे प्रॉस्पेक्टिव कहा जाता है। यह दस्तावेज़ घोषणापत्र की तरह होते हैं। यह उन सभी चीजों को सूचीबद्ध करता है जो कंपनी आय से एकत्र किए गए धन के साथ करने का इरादा रखती है। यहां अंतर केवल इतना है कि अगर कंपनी पैसे का दुरुपयोग करती है, यानी कि अपने द्वारा किए गए ‘वायदे’ को लागू नहीं करती है, तो कंपनी, उसके प्रमोटर, निदेशक और प्रमुख अधिकारी भारी जुर्माना के साथ, जेल सहित सभी प्रकार के दीवानी और आपराधिक अभियोजन के लिए उत्तरदायी होते हैं।

इतना ही नहीं जिस व्यक्ति पर अपराध सिद्ध हो जाता है वह दोबारा किसी कंपनी का निदेशक नहीं बन सकता है। चुनाव से पहले, प्रत्येक राजनीतिक दल गद्दी को पाने के लिए और बड़े-बड़े वायदों का पूरा करने के लिए एक लोकाभुवाना घोषणापत्र बनने की दौड़ में शामिल हो जाती हैं। यह घोषणापत्र उस वक्त  बहुत सारी सरकारी नीति का आधार बन जाता है। जो किसी भी पार्टी के लिए सरकार बनाने के लिए एक आसान रास्ता बना जाता है।

अभी हाल के ही सालों में ही आपने देखा होगा कि भाजपा ने लोकसभा चुनाव 2014 और 2019 के दौरान  अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण, कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाने के बारे में जिक्र किया था। जिसका परिणाम यह हुआ कि हिंदू दक्षिणपंथी वोट  भाजपा के पक्ष में चले जाए। जबकि इसके दूसरी ओर रोजगार के मुद्दे को आसानी से भूला दिया गया। सरकार ने जिस दो करोड़ नौकरियों की बात कही थी वह कोरी साबित हुई। जबकि इसके इत्तर राम मंदिर का निर्माण और धारा 370 को भी हटा दिया गया। लेकिन जॉब के नाम पर पिछले साल जब परीक्षार्थियों ने विरोध प्रदर्शन किया तो रेलवे और एनटीपीसी की परीक्षा का समय निर्धारित किया गया।

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सिर्फ भाजपा की बात क्यों?

भाजपा की बात, इसलिए कि वे वर्तमान में सत्ता में हैं । इसलिए जरुरी है कि बात पहले उनकी ही होनी चाहिए। सत्ता मे आने से पहले भाजपा ने पिछले 70 वर्षों में राष्ट्र के लिए की गई सभी बुराइयों को दूर करने” का वायदा किया था। इस बात को चुनावों को दौरान बार-बार दोहराया गया, लोगों को जहन में यह बात डाली गई कि 70 साल के दौरान देश में कुछ नहीं हुआ है। असली परिवर्तन अब होगा।  अफसोस की बात तो यह कि जिन वायदों के साथ भाजपा सत्ता मे आई थी।

वे सभी चुनावी वायदें कोरे साबित हुए। बल्कि उन दक्षिणपंथी लोगों का सपना पूरा हो रहा है जो ‘हिंदू राष्ट्र चाहते थे। ध्यान देने वाली बात यह है कि सत्ता के भूखे लोग यह भूल गए है कि दक्षिणपंथी भी इंसान हैं। उनका भी परिवार है, जिसे उन्हें मूलभूत सुविधाएं देनी होती है। जिसके तहत उनके परिवार का खाना-पीने के साथ, अच्छी शिक्षा और अच्छी स्वास्थ्य सुविधा मिल पाए। सरकार को कम से कम उनका ख्याल रखना चाहिए था।

जनता को अशिक्षित रखा गया ताकि वह सवाल न उठा सके

भारत एक ऐसा देश है जहां जाति और धर्म के आधार पर राजनीति की जाती है।  आजादी के समय मुसलमानों के मन में हल्का डर इसका बात का डाला गया कि वह स्वतंत्र भारत सुरक्षित नहीं है। क्योंकि भारत हिंदू बहुल देश है। जिसके परिपेक्ष्य में मुस्लिम बहुल देश बनाया गया। साल 1971 में पाकिस्तान का एक बार और विभाजन हुआ और बांग्लादेश का उदय हुआ। हिंदुओं के पाकिस्तान से हिंदू बहुल क्षेत्रों में जाने के साथ बड़े पैमाने पर पलायन हुआ। वही दूसरी ओर बड़ी संख्या में मुसलमानों ने पाकिस्तान की धार्मिक सुरक्षा के लिए हिंदू बहुसंख्यक भारत को छोड़ दिया।

काग्रेस को एक धर्मनिरपेक्ष देश के तौर पर मुस्लिमों को एक पहचान देनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। जिसका नतीजा यह हुआ कि हिंदू बहुल देश में  कई जातियां और उपजातियां की पहचान हुई। इतिहास इस बात का गवाह है कि निचली जातियों के साथ पिछली शताब्दियों में बहुत ही घटिया व्यवहार किया गया था। उन्हें मुख्यधारा के समाज से एकदम दूर रखा गया। जिसका नतीजा यह हुआ कि वह देश के किसी भी हिस्से में किसी भी क्षेत्र में आगे नहीं बढ़ पाएं।

आजादी के बाद, देश में धन, भोजन, स्वास्थ्य देखभाल, शिक्षा आदि सभी चीजों की भारी कमी थी। इसलिए इन निचली जातियों और जनजातियों, जिन्हें अब अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति कहा जाता है , को मुख्यधारा में लाने के लिए, अब सरकारी स्कूलों और सभी कॉलेजों में सीटें अनिवार्य रूप से आरक्षित कर दी गईं, और उनके लिए कम अंक में सरकारी नौकरियों में आने का प्रावधान लाया गया, ताकि उन्हें आगे आने में सक्षम बनाया जा सके।

कोटा(आरक्षण) मुख्यरुप से अस्थायी था और एक दशक या उससे अधिक समय तक चलने वाली इस व्यवस्था का अंत होना चाहिए था। अब ऐसा माना जा रहा है कि देश में पढ़ाई के लिए अनेक स्कूल, कॉलेज, यूनिर्वसिटी खुल गए है। इसके साथ ही नौकरियों भी बहुत हो गई है। जिसके मद्देनजर अब इस व्यवस्था का अंत हो जाना चाहिए।  उस समय एक मुस्लिम आबादी और अनुसूचित जाति और जनजाति का राजनीतिक महत्व राष्ट्र के संस्थापकों में नहीं था। लेकिन अब देश आजाद हुए 73 साल हो गए हैं। अब जरुरी  है कि जो आरक्षण दिया गया था उसका अंत होना चाहिए।

चूंकि कांग्रेस ने अनुसूचित जातियों और जनजातियों के उत्थान के लिए आरक्षण की मदद ली थी। लेकिन इसके दूसरी तरफ मुसलमानों को दरकिनार कर दिया, उनके उत्थान के लिए कुछ नहीं किया गया। सच्चर कमीशन की रिपोर्ट इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। जबकि देखा जाए तो मुस्लिम लंबे समय से कांग्रेस का वोट बैंक रहे हैं। जिसके बल पर उसने कई चुनाव जीते है।  यहां तक की सबसे ज्यादा सीटों वाले यूपी में भी मुसलमानों की संख्या 19.3% है। जिसके बदौलत लंबे समय तक कांग्रेस की सरकार बनती रही है।

मुस्लिम वोटबैंक को हमेशा से सुरक्षित रखने की कोशिश की गई

मुस्लिम वोट बैंक को सुरक्षित रखने के लिए कांग्रेस ने मुस्लिम नेताओं के तौर मौलवियों का चयन किया। क्योंकि समुदाय के लोग इनकी बात को सुनते हैं उन्हें अपने समुदाय के भीतर महत्व और विश्वास देते थे। इनकी इन्हीं बातों के लिए राजनीतिक पार्टियों इन्हें महत्व देती है। लेकिन इसके दूसरी तरफ समर्थन करने वाली मुस्लिम आबादी को क्या मिला रहा हैएक इंसान की तरक्की का  सबसे बड़े हथियार शिक्षा से भी उन्हें दूर रखा जा रहा है। इन्हीं मौलवियों द्वारा इन्हें बताया जाता है कि मदरसा शिक्षा ही इनके लिए सबसे बेहतर है। इनकी शिक्षा सिर्फ पवित्र कुरान तक ही सीमित है। जिसका नतीजा यह है कि बड़े पदों तक मुस्लिम समुदाय के  बच्चे पहुंच नहीं पाएं। जिसका फलस्वरुप वह गरीबी में ही जीवनयापन कर रहे थे।

Pic Source- The wire

कांग्रेस के बाद यूपी में मुसलमानों के वोटबैंक पर 80 के दशक में समाजवादी पार्टी ने कब्जा कर लिया।  वहीं दूसरी ओर मायावती की  बहुजन समाजवादी पार्टी द्वारा अनुसूचित जाति के वोट पर कब्जा कर लिया गया।  जिसका परिणाम यह हुआ कि सबसे ज्यादा सीटों वाले यूपी में धीरे-धीरे करके कांग्रेस वोटबैंक के मामले में विलुप्त होती गई।  यह सब होने के साथ, और मुसलमानों को असुरक्षित महसूस कराने के लिए, उत्तर भारत के कस्बों में कभी-कभी दंगे भड़काए गए, जो बदले में हिंदुओं को असुरक्षित महसूस कराते थे – जिसने आरएसएस को हिंदुओं के रक्षक के रूप में महत्व दिया, पक्षपाती सरकार के खिलाफ जो कथित तौर पर मुसलमानों का समर्थन कर रहा था।

इस स्थिति में हर राजनीतिक पार्टी ने लोगों को खुश करने और अपने वोटबैंक को मजबूत करने के लिए अपने आप को जनता के सामने अपना सबसे बड़ा शुभचिंतक के रुप में पेश किया। जनता इन्हीं द्वारा बताई गई बातों के आधार पर लोगों अपना वोट दें और अशिक्षित, अपराधिक लोगों को अपना प्रतिनिधि चुन लेते हैं।

जनता को शिक्षित किया जाए

 इसलिए जरुरी है कि जनता को शिक्षित किया जाए। बुनियादी शिक्षा के साथ, जीवनयापन करने के लिए कौशल युक्त शिक्षा दें।  भले ही वह रोजागार के तौर पर पकोड़े ही तले, ऐसे में भी उन्हें कौशल दिया जाए। कॉलेज डिग्री के साथ-साथ प्रोफेशनल डिग्री दी जाए, ताकि वह डिग्री के अभाव में नौकरी से वंचित न रह जाए। थोड़ा समझदार बनें और नेताओं को झांसे में न आएं। ऐसा करने के लिए शिक्षा संस्थानों की संख्या, जनसंख्या वृद्धि से भी ज्यादा तेजी से  बढ़नी चाहिए. (याद रखें – स्वतंत्रता के समय हमारे देश में मेडिकल, प्राथमिक शिक्षा और अन्य चीजों को भरी कमी थी।

इसने कुशल श्रमिकों के मामले में अर्थव्यवस्था को मजबूत किया होगा – दोनों स्वरोजगार और जो प्रमुख रूप से रोजगार योग्य थे (आज हम बड़े पैमाने पर बेरोजगार युवाओं की एक बड़ी युवा आबादी इसमें शामिल हो गई हैं), सभी स्तरों पर शिक्षक, स्वास्थ्य देखभाल (पर्याप्त चिकित्सा कर्मचारियों के साथ), खेती के तरीकों में सुधार, फिर से शिक्षा के कारण, बड़े पैमाने पर एक बेहतर और अधिक जिम्मेदार समाज का निर्माण किया जा सकता है।

 यह किसी भी राजनीतिक दल के अनुकूल नहीं था, चाहे उनका आधिकारिक राजनीतिक झुकाव कुछ भी हो, क्योंकि खेल ‘राष्ट्र पहले’ या राष्ट्रीय विकास नहीं है, बल्कि किसी भी कीमत पर सत्ता को पाना है। राष्ट्र की सेवा तो अंत में आती है।  हर पार्टी पहले अपना सुख देखती है। जनता अपना ध्यान स्वयं रख लेगी। आप सभी ने कुछ दिन पहले ही हमारे प्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने को यह कहते सुना होगा कि आत्मनिर्भर बनें। स्थिति के हिसाब से अब जरुरी है कि जनता समय रहते समझ जाए और अपना रास्ता तय करें।

Translated By: Poonam Masih

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अगर आप भी बनवाना चाहते है लर्निंग लाइसेंस, तो अगले हफ्ते से ऑनलाइन करें अप्लाई,

अगले हफ्ते से ऑनलाइन  मिलेगा लाइसेंस


आपको बता दें कि जल्द ही दिल्ली के लोगों को एक बड़ी खुशी मिलने वाली है। दिल्ली सरकार जनता को बड़ी राहत देने जा रही है। अब दिल्ली के लोगों को वाहन से जुड़े कार्यों के लिए दिल्ली परिवहन विभाग के दफ्तर जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। दिल्ली सरकार द्वारा लर्निंग लाइसेंस तो अगले हफ्ते से ही घर बैठे मिलने लगेगा। इतना ही नहीं इसके साथ दिल्ली परिवहन विभाग द्वारा अगले 15 दिन में लोगों को घर पर ही ऑनलाइन तरीके से बाकी 60 सेवाएं भी ऑनलाइन मिलनी शुरू हो जाएगी।

60 से ज्यादा सेवाओं का ऑनलाइन चल रहा है ट्रायल

आपको बता दे कि दिल्ली के लोगों की सहूलियत के लिए दिल्ली सरकार के द्वारा परिवहन विभाग की सेवाओं को ऑनलाइन कर दिया है। दिल्ली के परिवहन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी द्वारा बताया गया है कि अभी परिवहन विभाग के 60 से ज्यादा सेवाओं का ऑनलाइन ट्रायल चल रहा है जो की अपने अंतिम चरण में है। और अगले 15 दिन के भीतर यह सुविधाएं ऑनलाइन शुरू कर दी जाएंगी। चरणबद्ध तरीके से इसमें करीब 70 सेवाओं को जोड़ा जाएगा।

और पढ़ें: राम मंदिर ट्रस्ट की डील का क्या है पूरा घोटाला?

दिल्ली परिवहन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि इस तेज भागती जिंदगी में आम लोगों का बहुत ज्यादा समय परिवहन विभाग के दफ्तर के चक्र लगाने में निकल जाता है। इसलिए उन्होंने लोगों को परिवहन विभाग के दफ्तर आने से छुटकारा देने के लिए सभी सेवाओं को ऑनलाइन करने का फैसला किया है। अब आप ड्राइविंग लाइसेंस, लाइसेंस रिन्यूअल, अनापत्ति प्रमाण पत्र, रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट समेत कई चीजों के लिए ऑनलाइन आवेदन कर सकते है।

आपको बता दें कि हर महीने दिल्ली के 13 क्षेत्रीय कार्यालयों में ड्राइविंग लाइसेंस और वाहनों के रजिस्ट्रेेशन से जुड़े लाखों आवेदन आते है। जिसके कारण सभी दफ्तरों में हमेशा भीड़ रहती है। इन सभी परेशानियों को देखते हुए ही दिल्ली परिवहन विभाग ने अपनी सेवाएं ऑनलाइन करने का फैसला किया है। अभी दिल्ली में 60 से ज्यादा सेवाओं को ऑनलाइन करने की तैयारियां आखिरी चरण में हैं। सबसे पहले परिवहन विभाग द्वारा लर्निंग लाइसेंस की सेवा ऑनलाइन होगी। उसके बाद धीरे धीरे सभी सेवाएं ऑनलाइन हो जाएगी।

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राम मंदिर ट्रस्ट की डील का क्या है पूरा घोटाला?

राम मंदिर ट्रस्ट डील से राजनीतिक रुप से किसे हो रहा सबसे ज्यादा नुकसान


रविवार की शाम अचानक से सारे टीवी चैनल्स पर ये खबरे आऩे लगी की राम मंदिर ट्रस्ट ने जमीन खरीदने में घोटाला किया है।  इस खबर के आने के बाद ही यह आग की तरह फैल गई। जिसमें राजनीति एंगल भी खोजा जाने लगा।  ऐसा कहा जा रहा है कि मात्र 2 मिनट के अंदर 16 करोड़ का घोटाला हुआ है। क्या है पूरा मामला आईये आपको विस्तार से बताते है.

पिछले साल पांच अगस्त को राम जन्मभूमि का शिलान्यास विधि विधान के साथ किया गया। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार मोदी सरकार ने फरवरी 2020 में राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट  का गठन किया। जिसमें 15 सदस्यों में से 12 सदस्य मोदी सरकार द्वारा नामित किया गए थे। अब इस जमीन के लेकर विवाद शुरु हो गया है।  जिसके अनुसार कुसुम पाठक और हरीश पाठक ने सुल्तान अंसारी समेत आठ लोगो को 2 करोड़ में यह जमीन बेची थी। जिसकी कीमत मात्र 15 मिनट में बढ़कर  18 करोड़ हो गई।

सपा नेता पवन पांडेय ने लगाया भ्रष्टाचार का आरोप

इसके तुरंत बाद ही इनसे राजनीति रुप ले लिया। इस मामले में सपा के नेता पवन पांडेय पर भी लैंड लीड को लेकर आरोपों का बाजार हैं। इस बीच उन्होंने स्वयं ही ट्रस्ट पर घोटाले का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि राम जन्मभूमि की जमीन से लगी एक जमीन पुजारी हरीश पाठक और उनकी पत्नी ने 18 मार्च की शाम सुल्तान अंसारी और रवि मोहन को दो करोड़ रुपये में बेची। वही जमीन कुछ मिनट बाद चंपत राय ने राम जन्मभूमि ट्रस्ट की तरफ से 18.5 करोड़ रुपये में खरीद ली । जिस पर मैं भ्रष्टाचार का आरोप लगा रहा हूं। आपको बता दें कि पवन पांडेय यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव के करीबी माने जाते हैं।

पवन पांडेय ने आरोप लगाया है कि 10 मिनट पहले जमीन का बैनामा(डीनॉमिनेशन) 2 करोड़ में हुआ। उसी दिन सिर्फ 18.5 करोड़ में एंग्रीमेंट हुआ। एंग्रीमेंट और बैनामा दोनों में ही ट्रस्टी अनिल मिश्रा और अयोध्या नगर नियम के मेयर ऋषिकेश उपाध्याय गवाह है।  पवन पांडेय का कहना है कि जिस जमीन को 2 करोड़ में खरीदा गया है उसी जमीन का एंग्रीमेंट 18 करोड़ में कैसे हो गया?  इस घोटाले के लिए वह लगातार सीबीआई जांच की मांग भी कर रहे है। मेयर पर लगते आरोपों के बीच उन्होंने कहा कि मैं तो तमाम मंदिरों के प्रॉपर्टी सेल में गवाह रहा हूं, लेकिन डील तो बायर और सेलर के बीच होती है। उससे गवाह का कोई लेना-देना नहीं।

राजनीतिक रुप से तुल पकड़ने के बाद आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने कहा कि झूठ पकड़ा गया है  5 करोड़ 80 लाख है।  ये जमीन सुल्तान अंसारी और रवि मोहन तिवारी को 2 करोड़ में मिली तो 5 मिनट बाद ट्रस्ट को 18.5 करोड़ में क्यों मिली?  अब इस मामले को अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से जोड़ा जा रहा है। पार्टी का कहना है कि उन्हें बदनाम करने के लिए यह सब किया जा रहा है।

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चंपत राय का बयान हम पर तो गांधी की हत्या का भी आरोप है

वहीं दूसरी ओर इस आरोप के बारे में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय का कहना है कि सभी प्रकार की कोर्ट फीस और स्टैंप पेपर की खरीददारी ऑनलाइन हो रही है। 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट का आदेश आने के बाद से अयोध्या में जमीन खरीदने के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग यहां आने लगे। जिसके कारण यहां जमीन का दाम बढ़ गया। अब जिस जमीन की चर्चा हो रही है वह रेलवे स्टेशन के पास है।

ट्रस्ट ने जितनी भी जमीन खऱीदी है वह सभी खुले बाजार से काफी कम कीमत पर खरीदी गई है। जमीन खरीदने के लिए वर्तमान विक्रतागणों से वर्षो पूर्व जिस मूल्य पर एंग्रीमेंट हुआ था उस जमीन को उन्होंने 18 मार्च 2021 को बैनामा कराया। इसके बाद ट्रस्ट के साथ एंग्रीमेंट किया। उनका कहना है कि राजनीति रुप से लोगों को गुमराह किया जा रहा है। वह यहीं नहीं रुके उन्होंने कहा कि हम पर तो गांधी की हत्या के भी आरोप लगे हैं। हम आरोपों से नहीं डरते, जो आरोप लगे हैं उसकी जांच करुंगा।

ट्रस्ट ने केंद्र सरकार को भेजी रिपोर्ट

श्री रामजन्म भूमि ट्रस्ट पर लगते आरोप प्रत्यारोप के बीच ट्रस्ट ने केंद्र सरकार और आरएसएस को इसकी रिपोर्ट सौंपी है। रिर्पोट में कई अहम बिंदु को रेखांकित किया गया है। जिसमें कहा गया है कि राजनीतिक कारणों से ट्रस्ट पर आरोप लगाए जा रहे हैं। रिपोर्ट में संबंधित जमीन के आसपास की जमीन की वर्तमान कीमतों की भी जानकारी दी गई है। इतना ही नहीं सौदे की एक-एक जानकारी उपलब्ध करवाई गई है। आपको बता दें सपा और आप द्वारा लगाए आरोपों के बाद केंद्र सरकार ने इसकी रिपोर्ट मांगी थी।

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कोरोना महामारी के बाद भी भारतीय शादियों में आ सकते है ये बदलाव

महामारी के कारण भारतीय शादियों में आए ये बदलाव


पिछले साल से फैला हुआ कोरोना वायरस आज भी रुकने का नाम नहीं ले रहा है। इसके कारण हम सभी लोगों  के जीवन में काफी ज्यादा बदलाव देखने को मिले है। इस कठिन समय ने हमें बहुत कुछ सिखाया है। इस पैनडेमिक में हम सभी लोगों ने छोटी छोटी चीजों में खुशियों के साथ रहना और ताम-झाम और भीड़-भाड़ से दूर रहना सीख लिया है।

इस पैनडेमिक में जिन भी लोगों ने शादी हुई है सभी लोगों ने अपने सारे बड़े-बडे़ अरमानों को भूलकर, जो उनसे संभव हुआ उसी में शादी की या फिर ये कहें बस शादी निपटाई। पिछले एक साल से हम सभी लोग कोरोना वायरस के साथ जी रहे है और आगे भी अभी इससे पूरी तरह निजात की गुंजाइश नज़र नहीं आ रही है, महामारी के कारण हमारे देश में शादियों में काफी ज्यादा बदलाव आए है। जिन्हें देखकर ऐसा लगता है कि इनमें से कुछ अब हमेशा रहेगा। तो चलिए जानते है कैसे महामारी के कारण भारतीय शादियों में बदलाव आए है।

बहुत कम लोगों के बीच शादी: ये बात तो हम सभी लोग जानते है कि महामारी के कारण अभी आम लोग हो या बॉलीवुड सितारे, सभी लोग बहुत कम लोगों के बीच शादी कर रहे है। अभी कुछ समय पहले ही बॉलीवुड अभिनेत्री यामी गौतम ने अपने परिवार वालों और करीबी रिस्तेदारों के बीच शादी की थी। वही अगर हम टीवी एक्टर अंकित गेरा की बात करें तो उनकी शादी में भी सिर्फ दस लोग  ही मौजूद थे।

और पढ़ें: कोरोना से जंग के लिए इन देशों ने शुरू किया बच्चों का टीकाकरण, जाने भारत में कब से शुरू होगा

मास्क और सैनिटाइजर: शादियों में बहुत मुश्किल होता है कि पहले गेस्ट से मिलने से पहले उन्हें हैंड सैनिटाइज दिया जाए उसके बाद ही उन्हें आगे बढ़ने दिया जाए। पहले लोग अपने गेस्ट का मुस्कुराते चेहरे के साथ स्वागत करते थे लेकिन अब मास्क के कारण मुस्कुराते चेहरे के साथ लोगों के स्वागत वाली बात भी नहीं रहेगी।

लोगों को ग्रीट करने का तरीका: अब समय पहले जैसा नहीं रहा। पहले लोग दूल्हे के परिवार वालों को गले लगाकर उनका स्वागत करते थे लेकिन अब चीजे बदल गई है। अब आपको दूल्हे के परिवार वालों को नमस्ते, खम्मा घणी, आदाब के साथ उनका स्वागत करना होगा। हमारे देश में पहले कई जगहों पर संबंधी मिलन का चलन था जिसमे दरवाजे पर बारात लगने के बाद दूल्हा और दुल्हन दोनों के पिता, ताऊ, मामा, मौसा आपस में गले मिलते थे। लेकिन अब इस महामारी के कारण ये सब नहीं हो पायेगा।

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कोरोना से जंग के लिए इन देशों ने शुरू किया बच्चों का टीकाकरण, जाने भारत में कब से शुरू होगा

जाने क्यों बच्चों को टीकाकरण से बाहर रखा गया है


पिछले साल से फैला हुआ कोरोना वायरस आज भी रुकने का नाम ही नहीं ले रहा है पहले कोरोना की पहली लहर आई जिसमे लाखों लोगों की जान चली गयी। उसके बाद लोगों को लगा साल 2021 में उन्हें इस कोरोना वायरस से छुटकारा मिलेगा लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। इस साल भी कोरोना वायरस ने अपना कहर बरकरार रखा। इस बार हम सभी लोगों को कोरोना की दूसरी लहर का सामना करना पड़ा है कोरोना महामारी की दूसरी लहर पहली वाली से भी ज्यादा खतरनाक है। इस कोरोना वायरस की दूसरी लहर के दौरान लोगों को वायरस में म्यूटेशन के कारण कोविड-19 से संबंधित कई गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ा था। कोरोना की इस दूसरी लहर में सभी उम्र के लोगों में इसके लक्षण देखने को मिले थे। लेकिन इन सबके बीच अच्छी बात यह है कि अभी कोरोना की दूसरी लहर का असर लगभग थमता सा दिख रहा है। अब लोगों के मन में कोरोना की तीसरी लहर को लेकर कई तरह के सवाल आ रहे है। कई रिपोर्ट्स ये दावा कर रही है कि तीसरी लहर का असर बच्चों में अधिक देखने को मिल सकता है। अगर हम विशेषज्ञों की माने तो उनके अनुसार वैक्सीनेशन ही इसका एकमात्र उपाय है जो लोगों को संभावित तीसरी लहर से सुरक्षित कर सकता है तो चलिए जानते है क्यों अभी देश में बच्चों को टीकाकरण से बाहर रखा गया है।

जाने किन देशों में बच्चों को दी जा रही है वैक्सीन

आपको बता दे कि अमेरिका में सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन की अनुमति मिलने के बाद मई के मध्य से ही 12 साल से अधिक उम्र के बच्चों को फाइजर वैक्सीन देने की शुरुआत की जा चुकी है। सिर्फ अमेरिका ही नहीं बल्कि कनाडा, जापान, चिली और इटली ने भी 12 साल से अधिक उम्र के बच्चों को फाइजर वैक्सीन लगाने की मंजूरी दे दी है। जबकि अभी दुबई और फिलीपींस ने सिर्फ आपातकालीन उपयोग के लिए इस वैक्सीन को मंजूरी दे दी है।

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जाने फाइजर वैक्सीन बच्चों के लिए कितनी असरदार है

आपको बता दे कि हाल ही में न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित एक नए अध्ययन के अनुसार ‘वैज्ञानिकों ने फाइजर वैक्सीन के टीकाकरण वाले बच्चों में काफी असरदार प्रभाव देखे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार फाइजर वैक्सीन के दोनों डोस लेने के बाद बच्चों में वैक्सीन की प्रभाविकता 100 फीसदी के करीब देखी गई है। वैज्ञानिकों द्वारा 2,260 बच्चों पर किए गए अध्ययन में पाया कि फाइजर वैक्सीन लेने के बाद बच्चों में इसके अच्छे परिणाम देखने को मिले हैं।

जाने भारत में कब से शुरू होगा बच्चों का टीकाकरण

आपको बता दे कि भारत में वैक्सीन डे से ही बायोटेक ने बच्चों पर परीक्षण करना शुरू किया है। वही दूसरी तरफ कुछ मीडिया रिपोर्टस में दावा किया है कि जाइडस कैडिला कंपनी को भी बच्चों के वैक्सीन निर्माण करने का काम मिल सकता है। वही कुछ रिपोर्टस का दावा है कि फाइजर ने हमारे देश में अपनी वैक्सीन लाने के लिए भारतीय सरकार के साथ बातचीत की।  जिससे की अन्य देशों की तरह हमारे देश में भी बच्चों का टीकाकरण हो सकें। अभी भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के निदेशक डॉ रणदीप गुलेरिया का कहना है कि हमारे देश में भी बच्चों की वैक्सीन सितंबर-अक्टूबर तक उपलब्ध कराने का प्रयास जारी है।

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कुशाभाऊ ठाकरे विश्वविद्यालय के नाम बदलने की प्रक्रिया: बीज तो पिछले 15 साल से ही बोया जा रहा था

कुशाभाऊ ठाकरे विश्वविद्यालय के नाम बदलने की  प्रक्रिया: नाम मे क्या रखा है ?


महान कवि विलियम शेक्सपियर भले ही मानते हों कि नाम में क्या रखा है, लेकिन राजनीति के लिए नाम में ही बहुत कुछ रखा है।  पिछली सरकार(भाजपा) ने जब छत्तीसगढ़ में बिलासपुर विश्वविद्यालय को अटल बिहारी बाजपेयी विश्वविद्यालय एवं नया रायपुर का नाम बदल कर अटल नगर किया, तो लगा कि नामों की या नाम बदलने की राजनीति छत्तीसगढ़ में अभी रुकने वाली नहीं है। आश्चर्यजनक नहीं कि अस्मिता की राजनीति के लिए नाम का बहुत महत्व है, चाहे वह क्षेत्र, जाति, धर्म या किसी भी अन्य आधार पर की जाए। नामों का नाम वही बदल सकता है जो सत्ता में हो और अक्सर सत्ताधारी नेता और पार्टियां स्थानों का नाम बदलने का शॉर्टकट अपनाकर उसके द्वारा अपने राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति करती हैं।

प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू बुद्ध और उनके जीवन-दर्शन से बहुत प्रभावित थे। शायद इसीलिए स्वाधीनता प्राप्ति के बाद बनारस का नाम बदल कर वाराणसी कर दिया क्योंकि यही इसका प्राचीन नाम था और बौद्ध ग्रंथों में भी इसी नाम का उल्लेख मिलता है। इस कदम के पीछे किसी किस्म की अस्मिता की राजनीति नहीं थी लेकिन इसके कारण एक ऐसी परंपरा की शुरुआत हो गई जो आज तक जारी है। हाल यह  है कि  वाराणसी नाम अभी तक आम जनता के बीच स्वीकृति नहीं पा सका है। शहर को आज भी बनारस कहा जाता है और वहां के लोग अपने बनारसीपन पर गर्व करते हैं। उस्ताद बिस्मिल्लाह खां अपने बनारसीपन के बखान का एक भी मौका नहीं चुकते थे। धार्मिक हिंदू भले ही इसे काशी कहें, लेकिन आम लोग शहर को बनारस ही कहते हैं।

वाराणसी नाम केवल सरकारी कामकाज में इस्तेमाल होता है। बाद में जब अस्मिता की राजनीति ने जोर पकड़ा तो बंगाली उपराष्ट्रवाद को तुष्ट करने के लिए कलकत्ता कोलकाता बन गया, तमिल उपराष्ट्रवाद के चलते मद्रास चेन्नई और मराठी अस्मिता के कारण बंबई मुंबई हो गया। साथ ही शैक्षणिक संस्थानों की बात करें तो सागर विश्वविद्यालय डॉ. हरि सिंह गौर विश्वविद्यालय सागर, जबलपुर विश्वविद्यालय रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर, अब इलाहबाद विश्वविद्यालय का नाम बदलकर प्रयागराज विश्वविद्यालय रखा जा रहा हैं। क्योंकि नाम अस्मिता और इतिहास के परिक्षेत्र में घुसने का प्रवेश द्वार है।

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नाम हमें हमारे इतिहास से जोड़ता है, वह इतिहास चाहे व्यक्ति का इतिहास हो, समूह या समाज का इतिहास हो या धर्म का इतिहास हो। कई बार विभिन्न कारणों से धार्मिक इतिहास सामाजिक या समूह के इतिहास को अपने में समेट लेता है। फिर समूह या समाज के अन्य लोग भी अपने इतिहास को अपने धार्मिक या राजनैतिक इतिहास से जोड़कर देखने लगते हैं। नाम हमें हमारी स्मृतियों से जोड़ता है, साथ ही नई स्मृतियां सृजित भी करता है। यह हमारे मन मस्तिष्क में बार-बार आवृत हो दीर्घकालिक स्मृतियां सृजित करता है। दुनिया के दो अत्यन्त महत्वपूर्ण इतिहासकारों एरिक हॉब्स

बॉम और ट्रांस रेंजर ने नई स्मृतियों के निर्माण की प्रक्रिया को समझते हुए इन्वेशंन ऑफ ट्रेडिशन (परंपरा के आविष्करण) की चर्चा की है। उनका मानना है कि हम कई बार समकालीन और आधुनिक उत्पत्तियों को भी अपनी प्राचीन परंपरा से जोड़कर अपने लिए वैधता प्राप्त करते हैं।

इसी वैधता को प्राप्त करने के लिए पत्रकार चिन्तक आदरणीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने साल 2005 में कुशाभाऊ ठाकरे जी के नाम पर पत्रकारिता विश्वविद्यालय की स्थापना की। जिनके नाम बदलने की चर्चा छत्तीसगढ़ व देश के दुसरे क्षेत्रों में हो रही हैं, साथ ही नाम बदलने के विरोध में संघ के छात्र संघ इकाई एबीवीपी व विशेष विचारधारा के समर्थित पत्रकार, बीजेपी के राजनेता खुलकर सामने आ गये हैं। कुछ पत्रकारों ने यह सवाल उठाया है कि छात्रों के डिग्री पर सवाल उठ जायेगा, सवाल तो लगातार विश्वविद्यालय द्वारा प्रदान किये गये पीएचडी, एमफिल व पीजी के डिग्री को आप सभी को उठाने थे आप ने नहीं उठाये क्योंकि एक खास विचार धारा को स्थापित करना था चाहें वह गलत ही क्यों न हो। रही बात छात्रों के डिग्री प्रदान की गई डिग्री में नाम बदल जायेगा यह सवाल बिलासपुर विश्वविद्यालय से अटल बिहारी बाजपेयी विश्वविद्यालय बनने पर भी उठाने थे चूँकि अटल जी की स्वीकार्यता सार्वभौमिक हैं उनके नाम पर किसी भी राजनैतिक दल ने सवाल नहीं उठाये?

कुशाभाऊ ठाकरे जी के नाम पर पत्रकारिता विश्वविद्यालय के स्थापना पर पत्रकारों का एक बड़ा समूह सवाल उठाता रहा हैं। उनका कहना है कि कुशाभाऊ जी संघ प्रचारक एवं बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। यहां प्रश्न यह नहीं होना चाहिए की किनका किस क्षेत्र में कितना योगदान रहा है। सवाल स्थानीय स्वीकार्यता का होना चाहिए की स्थानीय जनता किसे स्वीकार कर रहीं हैं। विश्वविद्यालय अपने स्थापना के 15 साल का सफ़र तय कर रहा हैं। जहाँ केवल संघ की ब्रांडिंग नजर आती है जो अपने योग्य शिक्षकों, व्यवस्थित अध्ययनशालों व सुदृढ़ पुस्तकालय के आभाव में एक विचारधारा को पोषित करता नजर आया हैं। विश्वविद्यालय में आकादमिक गतिविधियों के जगह संघ के विचारधारा को बढ़ाने वाली गतिविधियों को ब्रांडिंग की गयी। विश्वविद्यालय को अपने संघी ब्रांडिंग से ऊपर उठकर समतावादी विचार को अपनाना होगा जो चंदूलाल चंद्राकर के पत्रकारिता एवं विचारों में रही हैं।

 नोट- इस आर्टिकल में सारे विचार लेखक के हैं। वन वर्ल्ड न्यूज का इनके विचारों से कोई लेनादेना नहीं है।

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अनलॉक में न भूले कोरोना के इन बेसिक नियमों को

अनलॉक के दौरान बचें ये गलतियों दोहराने से


पिछले साल से फैला कोरोना वायरस आज भी रुकने का नाम नहीं ले रहा है अभी हमारे देश में कोरोना वायरस की दूसरी लहर चल रही है। इस दौरान एक दिन में चार लाख से अधिक कोरोना के मामलों दर्ज किए गए थे। दूसरी लहर के वक्त कुछ ऐसी तस्वीरें निकल कर सामने आईं, जिन्हें देख कर सभी लोग सहम गया। कुछ दिन पहले ही हमे सांसों के लिए तरसते लोग, ऑक्सीजन की भारी कमी, जरूरी दवाओं की बड़े पैमाने पर कालाबाजारी और अस्पतालों में बेड की कमी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था। हालांकि अच्छी बात ये है कि अभी लगातार कोरोना के मामले कम होने लगे हैं। जिसके कारण कई राज्यों ने अनलॉक की प्रक्रिया शुरू कर दी है। लेकिन हमें विशेषज्ञों की बात भूलनी नहीं चाहिए। कोरोना की दूसरी लहर के बीच कुछ विशेषज्ञों ने कहा था कि कोरोना की तीसरी लहर का आना तय है। लेकिन अगर हम सुरक्षा मानदंडों का पालन करें और कुछ गलतियों को न दोहराएं तो शायद तीसरी लहर का प्रभाव कम होगा। तो चलिए जानते है उन गलतियों के बारे में जिन्हे हमे नहीं दोहराना चाहिए।

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अपनी जिम्मेदारी को भूले न

ये बात तो हम सभी लोग जानते है कि कोरोना के दौरान मास्क पहनना और सैनिटाइजर का इस्तेमाल करना बेहद जरूरी है यह हमें कोरोना से बचने में मदद करता है। लेकिन जैसे की अभी लगातार कोरोना के मामले कम होने लगे हैं। ऐसे में हमे सैनिटाइजर का इस्तेमाल और मास्क पहनना बिल्कुल भी नहीं भूलना चाहिए। हमें सभी लोगों को विशेषकर अपने परिवार वालों और दोस्तों को सावधान रहने के लिए कहना चाहिए। एक जिम्मेदार और जागरूक नागरिक होने के नाते हमें उन लोगों में जागरूकता फैलानी चाहिए, जिन्हें हम जानते हैं।

डॉक्टर से समय समय पर संपर्क करते रहें

आपने देखा होगा कि अक्सर लोग ख़ासी बुखार होने पर खुद दवा ले लेते है ये लोगों की सबसे बड़ी गलती होती है। लोगों को समझना चाहिए कि उन्हें स्वयं दवा नहीं लेनी चाहिए। कई केसों में ऐसा भी देखा गया है कि जब तक एक कोविड रोगी को बीमारी की गंभीरता का पता चलता है तब तक बहुत देर हो जाती है क्योंकि समय रहते वो बीमारी की गंभीरता से समझने में असफल रहता है वो डॉक्टर से जब तक संपर्क नहीं करता जब तक उससे डॉक्टर की बहुत ज्यादा आवश्यक न हो। लेकिन आपको बता दें कि हमेशा डॉक्टर के संपर्क में रहना और अपने स्वास्थ्य को अपडेट करना हमेशा अच्छा होता है। ताकि डॉक्टर आपको बता सकें कि आपके लिए क्या सही है।

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क्यों मनाया जाता है विश्व पर्यावरण दिवस? जाने इतिहास और थीम 2021

हर साल 5 जून को मनाया जाता है विश्व पर्यावरण दिवस


आपको बता दे कि हर साल विश्व पर्यावरण दिवस 5 जून को मनाया जाता है। इस विश्व पर्यावरण दिवस को मनाने का मुख्य उद्देश्य पर्यावरण के प्रति लोगों में जागरुक फैलाना है। आपको बता दे कि पहली बार विश्व पर्यावरण दिवस 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा द्वारा 5 जून को मनाया गया था। उसके बाद से ही हर साल 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाने लगा। आपको बता दे कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1972 में पर्यावरण और प्रदूषण पर स्टॉकहोम में एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहला पर्यावरण सम्मेलन आयोजित किया था। सबसे पहले विश्व पर्यावरण दिवस में 119 देशों ने हिस्सा लिया था। जैसा की आप देख सकते है कि अभी हमारे देश में लोगों की जनसंख्या काफी ज्यादा बढ़ गई है जिसके चलते दुनिया भर में प्रदूषण भी काफी ज्यादा बढ़ गया है। इसी प्रदूषण को कम करने के लिए और लोगों को इसके प्रति जागरुक करने के लिए विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है।

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विश्व पर्यावरण दिवस थीम साल 2021

हर साल विश्व पर्यावरण दिवस को मनाने के लिए एक थीम रखी जाती है। इस साल की थीम ‘Ecosystem Restoration’ यानि ‘पारिस्थितिक तंत्र की पुनर्बहाली’ है। अगर इसका मतलब सरल शब्दों में समझे तो इसका अर्थ है पृथ्वी को एक बार फिर से अच्छी अवस्था में लाना। इसके लिए हम सभी लोगों को स्थानीय स्तर से जमीनी प्रयास शुरू करने होंगे तभी हम इस पारिस्थितिकी तंत्र को सुरक्षित कर पाएंगे। इतना ही नहीं आपको बता दे कि इस बार पाकिस्तान विश्व पर्यावरण दिवस का वैश्विक मेजबान होगा।.

विश्व पर्यावरण दिवस का महत्व

ये बात तो हम आपको पहले भी बता चुके है कि हर साल पर्यावरण की रक्षा के लिए और लोगों को इसके प्रति जागरुक करने के लिए विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है हर साल 5 जून को बड़े ही धूमधाम से यह विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। ये हम सभी लोगों की जिम्मेदारी है कि हम अपने पर्यावरण को साफ़ और सुरक्षित रखें और उसकी रक्षा करें। हमे जितना हो सकें पेड़ पौधे को कटने से रोकना चाहिए। इस विश्व पर्यावरण दिवस को मनाने की समझे बड़ी वजह यही है कि इस दिन लोगों को पर्यावरण के प्रति सचेत किया जा सकें।

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दादी की छोटी सी बागवानी को एक पोते गौरव ने बनाया लाखों का बिज़नेस

जाने कौन है गौरव जक्कल और कैसे बढ़ाया उन्होंने अपनी दादी के बिज़नेस को


हम सभी लोग इस कहावत को तो बचपन से ही सुनते हुए आ रहे है शायद आपने भी सुना ही होगा “दादा लाए, पोता बरते”। यह कहावत घर, पैसा, जमीन, फर्नीचर, गहनों और पेड़-पौधों तक पर भी लागू होती है। आपने भी अपने दादा दादी से सुना होगा कि गांवों में बड़े-बुजुर्ग यह सोचकर पेड़ पौधे लगाते हैं कि जब वो पेड़ बनेंगे होंगे तो उनकी पीढ़ियों दर पीढ़ी उनके बच्चों को छांव देंगे। इस बात का आज हम आपको एक जीता-जागता उदाहरण देने जा रहे है। ये उदाहरण है महाराष्ट्र के सोलापुर में रहने वाला 28 साल के गौरव जक्कल का, जो की एक मैकेनिकल इंजीनियर हैं। कुछ समय पहले ही गौरव जक्कल ने अपना लिथियम आयरन बैटरी बनाने का काम शुरू किया है। इसके साथ ही साथ वह अपने पिता के साथ मिलकर अपने घर की छत पर बने गार्डन की देखभाल भी करता है। उनकी छत का ये गार्डन किसी बड़े बागान से कम नहीं हैं। उनकी छत के इस गार्डन में सैकड़ों प्रजातियों के हजारों पेड़-पौधे हैं। तो चलिए आज हम आपको इस गार्डन की एक दिलचस्प कहानी बतायेगे। कैसे, कब और किसके द्वारा शुरू हुआ था ये गार्डन।

Image Source- BetterIndia

जाने गार्डन को लेकर क्या कहना है गौरव जक्कल

एक मीडिया इंटरव्यू में गौरव जक्कल ने बताया कि इस गार्डन को मेरी दादी लीला जयंत जक्कल ने शुरू किया था। आगे वो कहते है मेरी दादी को पेड़-पौधों का बहुत ज्यादा शौक था। दादी ने ही सबसे पहले 1970 में छत पर पौधे लगाना शुरू किया था और देखते ही देखते ये गार्डन कब नर्सरी में तब्दील हो गया हमे पता ही नहीं चला। उनका कहना है कि अक्सर लोग दादी के पास आकर पेड़-पौधे और बागवानी से जुड़ी जानकारियां लेने आते थे। गौरव जक्कल आगे कहते है कि हमारे यहाँ सोलापुर में तापमान बहुत अधिक रहता है जिसके कारण हमारे वहां छत पर बागवानी करना कोई आसान काम नहीं है। लेकिन मेरी दादी ने कभी हार नहीं मानी।

और पढ़ें: जानें कोरोना और लॉकडाउन के बीच प्रैक्टिकल क्लासेज कैसे कर रही स्टूडेंट्स के भविष्य को प्रभावित….

जाने सीजनल नर्सरी से गौरव ने कितने की कमाई की

गौरव जक्कल बताते है कि मेरी दादी ने कई स्थानीय किस्मों के पौधों के साथ-साथ कई विदेशी किस्म के पेड़-पौधों भी लगाएं और उनकी लगातार मेहनत से उन्हें सफलता भी मिली। आगे गौरव जक्कल बताते हैं दादी ने जो गार्डन का काम शुरू किया था उसकी जिम्मेदारी अब उन्होंने उठा ली है। क्योंकि अब मेरी दादी की उम्र लगभग 90 साल हो गई है और ऐसे में उनके लिए छत पर आना जाना मुश्किल होता है। इसलिए अब गौरव जक्कल अपने पिता के साथ मिल कर गार्डन की देखभाल करते हैं। गौरव आगे कहते है आज के समय पर पेड़-पौधों की मांग को देखकर उन्होंने अपने गार्डन को सीजनल नर्सरी का रूप दे दिया है। उन्होंने कहा वैसे तो दादी के समय से ही हम पौधे तैयार कर रहे हैं, लेकिन अब जब पौधों की मांग ज्यादा हो गयी तो ऐसे में हम बारिश के मौसम से पहले ही नर्सरी का काम शुरू कर देते है। अगर गौरव ने बताया कि सोलापुर और उनके आसपास के लोग उनके पास पौधे लेने के लिए आते है जिसे उन्हें सात महीनों में लगभग साढ़े चार लाख रुपए से ज्यादा की कमाई हुई।

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जानें कोरोना और लॉकडाउन के बीच प्रैक्टिकल क्लासेज कैसे कर रही स्टूडेंट्स के भविष्य को प्रभावित….

ऑनलाइन प्रैक्टिकल की क्लासेज में उतना समझ में नहीं आता- स्टूडेंट


पिछले साल अचानक हुई तालाबंदी ने लोगों घरों पर रहने के लिए मजबूर कर दिया था। ज्यादातर काम घरों से ही होने लेगे। इसमें पढ़ाई भी शामिल है। गरीब हो या अमीर हर कोई अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा को देने के लिए ऑनलाइन क्लासेज का सहारा लेने लगा। नर्सरी से लेकर पीएचडी के कोर्स वर्क तक सभी चीजें ऑनलाइन होने लगी। पढ़ाई के लिए अब कोई दूसरा विकल्प भी नहीं बचा था। अब ऑनलाइन क्लासेज का सिलसिला शुरु हुए एक साल हो गया है।

इस बीच पिछले साल के सत्र के स्टूडेंट्स और इस साल भी नए सत्र के छात्रों का सीधा पाला ऑनलाइन क्लासेज से पड़ा है। ऑनलाइन क्लासेज के सहारे स्टूडेंट्स थियोरी की क्लास को तो कर ले रहे हैं लेकिन प्रैक्टिकल की क्लासेज करने लिए स्टूडेंट्स को बहुत परेशानी हो रही है। जिसके कारण वह प्रैक्टिकल नॉलेज से नदारदर रह जा रहे हैं। जो उनके भविष्य के लिए कहीं न कहीं नुकसानदायक है।

जबतक टूल्स के साथ प्रैक्टिकल नहीं करेंगे तब तक क्लास का कोई मतलब नहीं…

दिल्ली विश्वविद्यालय के भारती कॉलेज में सॉइकोलजी ऑनर्स में बीए सेकेंड ईयर की स्टूडेंट्स पंखुडी शर्मा का कहना है कि स्टूडेंट्स और उनके पेरेंन्ट्स की सेहत को ध्यान में रखते हुए कॉलेज को बंद रखना का निर्णय तो सही है। ऑनलाइन क्लासेज में पढ़ाया भी सबकुछ जाता है। सभी चीजें समझ में आती हैं लेकिन प्रैक्टिकल की क्लासेज में थोड़ी परेशानी तो है। ऑनलाइन क्लासेज में प्रैक्टिकल भी कराया जाता है। लेकिन  जितना समझ आप सामने रहकर समझ सकते हैं उतना नहीं हो पाता है। पंखुडी का कहना है कि प्रैक्टिल क्लासेज में जो टूल इस्तेमाल होते हैं। उनको जबतक आप सामने से नहीं देखते हैं या उनके साथ काम नहीं करते हैं तब तक प्रैक्टिल क्लासेज का न तो मजा आता है और न ही चीजें पूरी तरह से समझ में आती है। हमें प्रैक्टिकल की क्लासेज दी जा रही है। लेकिन ऑनलाइन में  बहुत सारी समस्या है। ल महामारी के इस दौर में हमारे पास दूसरा कोई विकल्प भी नहीं है।

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प्रैक्टिकल के कारण एक और साल हो सकता है बर्बाद

ऑनलाइन और प्रैक्टिल क्लासेज की परेशानी लगभग हर प्रोफेशनल कोर्सस में हो रही है। नेताजी सुभाषचंद्र बोस यूनिर्वसिटी जमशेदुर(झारखंड) के बीडीएस के एक छात्र ने नाम ना बताने की शर्त पर कहा कि सेकेंड ईयर और थर्ड ईयर की प्रैक्टिकल क्लासेस कोरोना के कारण नहीं हो पाई है। पिछले साल लॉकडाउन के बाद से प्रैक्टिकल की क्लासेस बंद थी। दिसंबर के अंतिम सप्ताह में यूनिर्वसिटी को खोला गया था। लेकिन स्टूडेंट्स डर के कारण नहीं आएं। कुछ दिन क्लासेस हुई थी कि दोबारा से कोरोना को कहर शुरु हो गया है। मेरा पूरा कोर्स प्रैक्टिकल के बेस पर है। लेकिन अब जब स्थिति इतनी गंभीर है तो क्या किया जाए। यूनिर्वसिटी की तरफ कहा गया है कि सबकु नॉर्मल होने पर प्रैक्टिल की क्लासेस करवाई जाएगी। लेकिन परेशानी तो स्टूडेंट्स को है उनका एक और साल इसके लिए खराब हो सकता है।

सिर्फ थियोरी से नहीं चलेगा

पिछले साल से शुरु हुआ लॉकडाउन का सिलसिला स्टूडेंट्स की पढ़ाई पर पूरी तरह से असर डाल रहा है। कभी स्टूडेंट्स के पास इंटरनेट की परेशानी है तो कहीं बिजली की, इन सबके बीच प्रैक्टिल की क्लासेज न होना स्टूडेंट्स के लिए भविष्य की चिंता बढ़ा रही है। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय(वर्धा) में एमएसडब्ल्यू की छात्रा पायल रामटेके का कहना है कि एमएसडबल्यू की क्लासेज जब से शुरु हुई थी। उस वक्त लॉकडाउन ही लगा हुआ था। कोरोना कम हुआ भी तो यूनिर्वसिटी में ऑनलाइन क्लासेज ही करवाई गई है। मेरा कोर्स ऐसा है सिर्फ थियोरी से नहीं चलेगा। जब तक बाहर जाकर प्रैक्टिल नॉलेज न लें, तब तक कोर्स का कोई मतलब नहीं है। बीए के दौरान हम ज्यादातर फील्ड मे जाते थे। कई एनजीओ में भी गए थे। लेकिन इस बार तो कुछ भी नहीं हो पा रहा है। सिर्फ ऑनलाइन क्लासेज ही हो रही है।

लगातार बढ़ते कोरोना केस और ऑनलाइन क्लासेज के बीच हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए प्रैक्टिकल नॉलेज की कमी होना तय है।

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