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क्यों मनाई जाती है गुरु पूर्णिमा ? बहुत ही अनोखी है वजह

कैसे करे गुरु पूर्णिमा पर गुरु की अर्चना ?


आज है गुरु पूर्णिमा और यह दिन हमारी जिंदगी में काफी महत्व रखता है. हमारी ज़िन्दगी में यह दो लोगो ज्यादा महत्व देते  है जो हमेशा हमें सही रास्ते पर चलने की सलाह देते है.एक माता-पिता और दूसरे हमारे गुरु. ये दोनों ही आपको हर गलत  मार्ग पर चलने से रोकते है और सही रास्ते पर चलने का रास्ता दिखाते है. वही हमारे देश में पौराणिक काल से गुरुओं को सम्मान दिया जाता है. ऐसा कहा जाता है किसी भी व्यक्ति को महान बनाने में माता- पिता के अलावा सबसे बड़ा हाथ उसके गुरु का होता है. जिनके ज्ञान और आशीर्वाद से वो हर मुकाम हासिल कर पाता है , जो वो पाना चाहता है.  

क्यों मनाई जाती है गुरु पूर्णिमा ?

गुरु पूर्णिमा इसलिए मनाई जाती है क्योंकि इस दिन महान गुरु महर्षि वेदव्यास का जन्म  हुआ था. महर्षि वेदव्यास ने ब्रह्म सूत्र, महाभारत जैसे कई  साहित्यों की रचना की है. शास्त्रों के अनुसार महर्षि व्यास को तीनो कालो  का ज्ञाता माना जाता है.इसके अलावा  शास्त्रों में आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन की वजह से भी गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है.

क्या है गुरु पूर्णिमा का ख़ास महत्व ?

ऐसा माना जाता है कि गुरु के बिना ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती है.इसीलिए इन्हें भगवान से भी ऊपर का दर्जा दिया जाता है.गुरुकुल में रहने वाले विद्यार्थी इस दिन अपने गुरु की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं. इसलिए इस दिन का ख़ास महत्व है.इस दिन मंत्रों का जाप भी करना चाहिए ये आपको आपके काम में सफल बनाने में मदद करेगी.

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चलो आज याद करे महात्मा गांधी के अल्फाज़ो को

महात्मा गांधी के अल्फाज़ो की महत्व


महात्मा गांधी ने हमारे देश को आज़ाद करने के लिए बहुत कुछ किया। गांधी के लिए हमारे मन में जो इज़्ज़त है उसको कोई कम नहीं कर सकता। हमें उसने इतना प्यार था कि कब वो हम सब के बापू बन गए, पता ही नहीं चला। और शायद तभी बापू को इस राष्ट्र का पिता माना जाता है। उन्हें ये दर्जा बिलकुल सही मिला है। वो हमेशा से ही प्रेम और अहिंसा में विश्वास रखते थे। महात्मा गांधी के अल्फाज़ो की कोई कीमत नहीं लगाई जा सकती है। उनका हर लफ्ज़ आज हमारे लिए ज्ञान के समान है।

महात्मा गांधी

तो चलिए आज याद करे महात्मा गांधी के अल्फाज़ो को:-

  1. अपने दोष हम देखना नहीं चाहते और दूसरों के दोष देखने में हमें मज़ा आता है। बहुत सारे दुःख इसी कारण से पैदा होते है।
  2. विश्वास करना एक गुण है, अविश्वास दुर्बलता की जननी है।
  3. अपने प्रयोजन में दृढ विश्वास रखने वाला एक सूक्ष्म शरीर इतिहास के रुख को बदल सकता है।
  4. पहले वो आप पर ध्यान नहीं देंगे, फिर वो आप पर हँसेंगे, फिर वो आप से लड़ेंगे, और तब आप जीत जायेंगे।
  5. मेरी अनुमति के बिना कोई भी मुझे ठेस नहीं पहुंचा सकता।
  6. आप मानवता में विश्वास मत खोइए। मानवता सागर की तरह है; अगर सागर की कुछ बूँदें गन्दी हैं, तो सागर गन्दा नहीं हो जाता।
  7. आप तब तक यह नहीं समझ पाते की आपके लिए कौन महत्त्वपूर्ण है जब तक आप उन्हें वास्तव में खो नहीं देते।
  8. पृथ्वी सभी मनुष्यों की ज़रुरत पूरी करने के लिए पर्याप्त संसाधन प्रदान करती है, लेकिन लालच पूरी करने के लिए नहीं।
  9. हमेशा अपने विचारों, शब्दों और कर्म के पूर्ण सामंजस्य का लक्ष्य रखें। हमेशा अपने विचारों को शुद्ध करने का लक्ष्य रखें और सब कुछ ठीक हो जायेगा।
  10. जिस दिन प्रेम की शक्ति, शक्ति के प्रति प्रेम पर हावी हो जायेगी, दुनिया में अमन आ जायेगा।
  11. जो लोग अपनी प्रशंसा के भूखे होते हैं, वे साबित करते हैं कि उनमें योग्यता नहीं है।
  12. सुख बाहर से मिलने की चीज नहीं, मगर अहंकार छोड़े बगैर इसकी प्राप्ति भी होने वाली नहीं। अन्य से पृथक रखने का प्रयास करे।
  13. जिज्ञासा के बिना ज्ञान नहीं होता | दुःख के बिना सुख नहीं होता।
  14. कुछ लोग सफलता के सपने देखते हैं जबकि अन्य व्यक्ति जागते हैं और कड़ी मेहनत करते हैं।
  15.  खुद वो बदलाव बनिए जो दुनिया में आप देखना चाहते हैं।
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चलिए याद करते हैं कबीरदास के भूले हुए दोहे

कबीरदास अपनी सदी के बहुत ही महान कवि थे। उन्होंने ऐसी बाते कही जो आज के वक़्त में हम सभी के लिए सीखना और समझना बहुत ही ज़रूरी है। उनके दोहे और कविताएं ऐसी है जो अब किताबो में ही सिमट के रह गयी है। इसिलए ज़रूरी है आज उनके कुछ अनमोल दोहों को फिर से पढ़ खुद को जागरूक करने का।

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलया कोई
जो मन खोजा आपने, तो मुझसे बुरा ना कोई।

अर्थ:- कबीरदास अपनी पंक्तियों में यह कहना चाटते है की जब मैं इस दुनिया में बुराई ढूंढने निकला तो मुझे कोई बुरा नहीं मिला। पर जब मैने खुद में बुराई ढूंढ़ी तो मुझे खुद से बुरा कोई नहीं मिला।

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया ना कोई,
ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होए।

अर्थ:- बड़ी बड़ी किताबें पढ़ और किताबी ज्ञान पा कर ना जाने कितने ही मृत्यु के द्वार पे पहुँच गए और खुद को विद्वान घोषित किया पर हर कोई विद्वान नहीं था। कबीर मानते है कि अगर तुम हज़ारो किताबें पढ़ने के बाद भी यदि प्रेम का ज्ञान नहीं सीखते तब तक तुम सच्चे तौर से ज्ञानी नहीं कहलाओगे।

तिनका कबहुँ ना निंदिये, जो पावन तर होये,
कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होये।

अर्थ:- कबीरदास कहते हैं की कभी भी पाँव के नीचे पड़े तिनके की निंदा नहीं करनी चाहिए क्योंकि अगर वही तिनका आँख में लग जाए तो बहुत पीड़ा देगा। इसी प्रकार कभी किसी व्यक्ति को खुद से कम या छोटा मत समझो।

कबीरदास

दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार,
तुरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार।

अर्थ:- इस संसार में मनुष्य का जन्म मुश्किल से मिलता है।यह मानव शरीर उसी तरह बार बार नहीं मिलता जैसे वृक्ष से पत्ता झड़ जाए तो दुबारा डाल पर नहीं लगता।

हिन्दू कहे मोहि राम पियारा, तुर्क कहे रहमाना,
आपस में दोउ लड़ी- लड़ी मुए, मरम न कोउ जाना।

अर्थ:- कबीर कहते है कि हिंदू राम के भक्त है और तुर्क (मुस्लिम) को रहमान प्यारा है। दोनों इसी बात पर लड़ लड़ कर मौत के मुँह में जा , तब भी कोई इस सच को न जान पाया।

जब गुण को गाहक मिले, तब गुण लाख बिकाइ,
जब गुण को गाहक नहीं, तब कौड़ी बदले जाई।

अर्थ:- काबिरदार मानते है कि जब गुण को परखने वाला गाहक मिल जाता है तब गुणों की कीमत होती है। जब गुणों का गाहक नहीं मिलता तब गुण यूही कौड़ियों के भाव चला जाता है।

माया मुई न मन मुआ, मरी मरी गया सरीर,
आसा त्रिसना न मुई, यों कही गए कबीर।

अर्थ:- संसार में रहते हुए न माया मरती है और ना ही मन। शरीर न जाने कितनी बार मर चुका है, पर मनुष्य की आशा और तृष्णा कभी नहीं मरती। और ये बात कबीर काफी बार कह चुके है।

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लड़की है या कोई मशीन…

लड़की है या कोई मशीन….


लड़की है या कोई मशीन,

या किसी के सपनों की दुकान,

जब चाहा उसके आगे खोल दी अपने ख्वाइशों की दुकान,

जब उसने आगे बढ़ना चाहा, तो बांध दिए मजबूरी के तार…

रख दिए उसके आगे छोटों की खुशियां और बड़ों के सपने,

अपने सपने को भूल दूसरों के सपने को अपना मान चल दी आगे,

जिसने जैसा चाहा उसने कर दिया,

जिसने जैसा कहा उसने मान लिया,

एक और लड़की ने अपना जीवन दाव पर लगा दिया,

उससे भी तो कोई पूछे वो,

लड़की है या कोई मशीन।।

लड़की है या

कितना समझाया उसे फिर भी समझ ना पाई वो,

घरवालों की खुशी में ही लड़की का सुख है…

यह बात बचपन से उसे समझी किसी ने जो थी,

घर के कामों में सुख और पढ़ाई में दुख पाओगी,

यह पाठ उसे किसी ने पढ़ाया था,

कितना समझाया फिर भी समझ ना पाई वो,

अपने ऊपर हो रहे अत्याचार को,प्यार समझ जो बैठी थी वो…

समझ तो मुझे नहीं आता…

लड़की है या कोई मशीन ।

यहाँ पढ़ें: आइए जाने किताबों को पढ़ने के फायदे

जिस कैंची से उसे कपड़े काटना सिखा रही थी उसकी मां,

यह भूल गई काट रही है पंख अपनी, बेटी के उसकी मां…

हद तो तब पार हो गई …

जब जिंदगी जीने के और  पिया के घर जाने के दिन गिनवा रही थी उसकी मां,

वह सच में एक मां थी!

यह बात मुझे समझ नहीं आई,

वो लड़की है या कोई मशीन,

लड़की है या कोई मशीन….

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आइए जाने किताबों को पढ़ने के फायदे

आइए जाने किताबों को पढ़ने के फायदे


आइए जाने किताबों को पढ़ने के फायदे:- आप के बहुत दोस्‍त होंगें लेकिन किताबें ए‍क व्यक्ति की सब से अच्छी दोस्त मानी जाती है। मगर कई लोगों को किताबें बोरिंग भी लगती है, वहीं दूसरी तरफ बहुत से लोगों को किताबें पढ़ना बहुत ही अच्छा लगता है। जिन लोगों को किताबें पढ़ना अच्छा लगता है उन्हें हर टॉपिक की किताबें पढ़ना अच्छा लगता है और वो हर टॉपिक की किताब पढ़ सकते है। वैसे तो किताबों से दोस्ती करने के लिए हमें बचपन से ही कहा जाता है। किताबों से दोस्ती करने से हमारे ज्ञान के भंडार में वृद्धि होती है। साथ ही हमारे व्यक्तित्व में भी निखार लाती है। इस दोस्‍ती से हमारे स्वास्थ्य पर भी कई सकारात्मक प्रभाव देखने को मिलते है।  चलिए आज हम आप को बताते है, किताबों को पढ़ने के फायदों के बारे में।

किताबें

किताबों को पढ़ने के फायदें

  • हर रोज किताबों को पढ़ने से आप का हर दिन खुशनुमा बना रहता है। जब भी आप फ्री हो तब किताबों को पढ़ सकते है। इस से आपका समय का सदुपयोग भी होता है और आप का समय भी आसानी से कट जाता है। इससे हम खाली वक्‍त में भी अच्‍छी बातें सोच पाते है।
  • किताब पढ़ने की आदत आप के दिमाग को लंबे वक्‍त के लिए जंवा रख सकती है। जिन लोगों का पेशा रचनात्मक कार्यों का होता है उन को किताबों जरूरी पढ़नी चाहिए। किताबें पढ़ने वालें लोगों का दिमाग अन्य लोगों की तुलना में ज्‍यादा होता है। साथ ही दिमाग करीब 32 प्रतिशत अधिक फ्रेश रहता है।
  • ऐसा माना जाता है, कि किताबों को पढ़ने वालों का आईक्यू लेवल अच्छा होता है। इस आदत से व्यक्ति रचनाशील बनता है और साथ ही सभी सवालों के जवाबों को सटिकता के साथ हल कर सकता है।
  • दरअसल, तनाव होने पर व्यक्ति के शरीर में हार्मोन में बदलाव होते है। किताबों को पढ़ने से व्यक्ति का मन शांत होता है और वह कार्टिसोल के स्तर को कम करता है। जिस से हम तनाव से दूर रहते है। इसलिए हमें किताबें पढ़नी चाहिए। तनाव दूर होने के साथ एक नए ज्ञान की प्राप्ति होती है।
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भूली इंसानियत

भूली इंसानियत


समाज की नियति जिसे बतलाते हो,

क्यूँ नाम सुनकर तुम मुझे मेरा काम बताते हो?

पूजते हो दुर्गा और लक्ष्मी को,

पर खुद राक्षक का किरदार निभाते हो।

क्यों खुद को इंसान कह कर,

इंसानियत का पाठ भूल जाते हो।

मुझे मेरा दायरा बताते हो,

भूली इंसानियत, प्रतीकात्मक तस्वीर
यहाँ पढ़ें : तीन दिन से जारी है पंपोर में सेना और आंतकियों के बीच मुठभेड़

पर अपनी हद्दे खुद भूल जाते हो।

मार कर सब को जीत रहे हो

ना जाने तुम कौन सी जंग,

तेरे मेरे लहू का है एक जैसा ही रंग।

इंसान बनाने में खुदा ने,

ना जाने कैसी भूल कर डाली,

ये गलती अब है ऐसी,

जो उससे भी ना सुधरने वाली।

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राणा यशवंत के कविता संग्रह ‘अंधेरी गली का चांद’ का हुए लोकार्पण

राणा यशवंत के कविता संग्रह ‘अंधेरी गली का चांद’ का हुए लोकार्पण


राणा यशवंत के कविता संग्रह ‘अंधेरी गली का चांद’ का हुए लोकार्पण:- राणा यशवंत के पहले कविता संग्रह ‘अंधेरी गली का चांद’ का लोकार्पण आज राजधानी दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब के हिंदी साहित्य में किया गया।

कई दिग्गजों ने हिस्सा लिया

इस मौके पर ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कवि केदारनाथ सिंह, साहित्य अकादेमी से पुरस्कृत कवि-कथाकार उदय प्रकाश, समकालीन हिंदी साहित्य के चर्चित साहित्यकार मंगलेश डबराल, साहित्य अकादेमी से पुरस्कृत हिंदी के साहित्य के चर्चित हस्ताक्षर अरुण कमल एवं नामचीन कवि देवेंद्र कुशवाहा ने संयुक्त रूप से हिस्सा लिया।

विमोचन के इस मौके पर हॉल सहित्य प्रेमियों से भरा हुआ था। इस कार्यक्रम में राणा यशवंत की इस पहली साहित्यिक कृतियों की भी प्रशंसा की गई।

अंधेरी गली का चांद का लोकार्पण

यहाँ पढ़ें : वरुण धवन बहुत जल्द अमिताभ बच्चन के साथ नजर आने वाले हैं

राणा यशवंत की सबने की तारीफ

विमोचन के मौके पर पहुंचे केदारनाथ सिंह ने राणा यशवंत को बधाई देते हुए कहा कि जिस तरह राणा हर खबर से एक नया एंगल निकालकर उसे बिल्कुल अलग तरीके से पेश करने के लिए जाने जाते हैं, वही कला उन्होंने अपनी कविताओं में भी दिखाई है, जिसके लिए वे वाकई बधाई के पात्र हैं।

जबकि, मंगलेश डबराल ने कहा कि वर्जनाओं को तोड़े बगैर बेहतर साहित्य की रचना असंभव होती है। मुझे खुशी है कि पहली ही कृति में राणा यशवंत ने न केवल प्रचलित वर्जनाओं एवं परंपराओं को ध्वस्त किया है, बल्कि अपने लिए एक नई धारा भी बनाई है, जो अति प्रवाहशील होने के साथ ही उत्साहवर्धक भी है।

उदय प्रकाश ने कहा कि बेहतर साहित्य रचना का मूल-मंत्र है- ‘जो डर गया, वह मर गया।’ अमूमन हर उभरता साहित्यकार नए प्रयोग करने से डरता-हिचकता है, लेकिन असली परीक्षा तभी होती है, जब आप डरे-हिचके बगैर साहित्य-सृजन कर लेते हैं। आज की पीढ़ी के साहित्यकार बहुत कुछ ऐसा ही कर रहे हैं, जो साहित्य के बेहतर भविष्य की ओर इशारा करते हैं।

अरुण कमल ने राणा यशवंत एवं उनकी पहली साहित्यिक कृति की प्रशंसा करते हुए कहा कि ‘अंधेरी गली का चांद’ के जरिये कवि ने वह कहने का साहस दिखाया है, जो कुछ उसके मन में था। अपनी बात कहने के लिए राणा यशवंत ने भावों-बिम्बों या प्रतिबिंबों का सहारा नहीं लिया है, बल्कि बेलाग और बेलौस होकर कविताओं के जरिये अपनी बात समाज के सामने रखी है।

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दिल से निकले पोस्ट-कार्ड की तरह है ‘फोटो-पोएट्री’ : अभिषेक गुप्ता

किसी एक पल को हमेशा के लिए जिंदा व याद रखने के लिए आप क्या कर सकते हैं? उस पल की तस्वीरें फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट पर पोस्ट कर देते होंगे! हम में से अधिकतर लोग कुछ ऐसा ही करते हैं, लेकिन अभिषेक गुप्ता का स्टाइल कुछ अलग है।

अभिषेक गुप्ता

अभिषेक गुप्ता ने अपनी ट्रैवल जर्नी को हमेशा के लिए जिंदा व यादगार बनाने के लिए एक अनोखा तरीका अपनाया है। जी हां, अभिषेक अपने उन खास लम्हों व पलों को तस्वीरों में कैद कर उसे खूबसूरत व अद्भुत तरीके से लोगों के बीच साझा करने वाले हैं! और वो तरीका है ‘फोटो-पोएट्री’ यानी तस्वीरों के माध्यम से कविता करना।

अभिषेक का कविता करने का यह अंदाज कुछ अलग व अनोखा है। ‘फोटो-पोएट्री’ के बारे में और अधिक जानने के लिए हम पंहुच गए अभिषेक गुप्ता के पास, जहां उन्होंने इससे जुड़ी कई दिलचस्प बाते हमसे की।

आइए पेश है, अभिषेक गुप्ता से बातचीत के कुछ मुख्य अंश…

आपके लिए ‘फोटो-पोएट्री’ क्या है?
मेरे लिए ‘फोटो-पोएट्री’ मेरे दिल से निकले पोस्ट कार्ड की तरह है। यह सबसे सुंदर व उपयुक्त तरीका है किसी दृश्य का वर्णन करने का। यह एक तस्वीर को जिंदा करने जैसा है।

फोटो-पोएट्री के पीछे की अवधारणा क्या है?
जीवन का आधार ही चित्र और शब्द होते हैं। मैं काफी लम्बे समय से ट्रेवल करता आ रहा हूं, तो बस मैं फोटो-पोएट्री के द्धारा उन तस्वीरों को खींच कर यह वर्णन करने की कोशिश करता हूं कि उस समय क्या हो रहा था और मैं उस समय क्या महसूस कर रहा होता हूं। ताकि पाठक इन तस्वीरों को देखकर उस समय को महसूस कर सके और इनकी भावनाओं को शब्दों द्धारा महसूस कर सकें।

कृपया, तस्वीरों में काव्य प्रेरणास्त्रोत समझाएं?
पिछले कुछ सालों में मैं जिस-जिस जगह गया और जिन लोगों से मिला प्रेरणा भी मुझे वहां से मिली। वहीं इसी के साथ अनुभव, स्थिति और भावनाओं ने भी काफी प्रेरणा देने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

किसी एक तस्वीर को चुनने के पीछे का सबसे अहम कारण क्या होता है?
मुझे लगता है कि एक फोटो-पोएट्री तभी बनती है, जब आप किसी जगह, व्यक्ति या स्थिति से कनेक्ट या रिलेट कर पाते हो। यह कहीं भी हो सकता है, दिल्ली की मेरी टैरेस गार्डन से स्विट्जरलैंड में आल्प्स की साइट को महसूस करना हो सकता है।

क्या आप बता सकते हैं कि आपकी यह किताब किस उद्देश्य दर्शकों के लिए है?
यह अनिन्टेन्डिड दर्शकों के लिए है। यह किताब हर किसी के लिए है और किसी के लिए नही है। किताब में आप अपने आप को ढुंढ पाओगे और किताब आपको अपने आप को ढुंढने में भी मदद करेगी। यह कविता सभी सीजन और सभी आत्माओं की लगातार आनंददायकता के लिए है।

कृपया, भावनात्मक वर्णन बताइए, आपको तस्वीर किस तरह से महसूस होती है?
मेरे लिए यह सभी तस्वीरें खास हैं। हर एक तस्वीर मुझमें एक अलग भावना ताजा करती है।

आपको क्या सरप्राइज करती है, फोटो या इसे करने के लिए आपकी प्रतिक्रिया?
वैसे तो दोनों ही मुझे बराबर सरप्राइज करती हैं। तस्वीर मुझे सरप्राइज करती है, क्योंकि हम जानते हैं कि एक जगह और उससे जुड़ी स्थिति दोबारा लौट कर नही आएगी। यह मेरे जीवन को अमर करने के लिए विशिष्ट पल की तरह है।

चलते-चलते अपने फ्यूचर के बारे में कुछ बताते चलिए..
दूसरा एडिशन इरिडेसन्स पर काम चल रहा है। इसके अलावा मैं एक स्व-सहायता प्रेरणादायक किताब पर भी काम कर रहा हूँ।

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माँ तू है किस मिट्टी की…

बाहर से दिखती है जितनी सख्त,अंदर से उतनी ही नरम
माँ तू है किस मिट्टी की, जो सहती है सारे गम ॥

सहती है सारे गम,फिर भी चुप रहती है
चुप रहती है, फिर भी करती है सबके काम अधूरे

करती है काम अधूरे सबके, कभी इसका, तो कभी उसका
कब तक दूसरों की परेशानियों को अपना बनाएगी, कभी तो अपने लिए भी जी ले माँ

बाहर से दिखती है जितनी सख्त, अंदर से उतनी ही नरम।
माँ तू है किस मिट्टी की,जो सहती है सारे गम ।।

घर में आफत आती है तो, ढाल बन कर खड़ी हो जाती है
ढाल बन कर बचाती है सबको, खुद पर आँच चाहे आ जाये

न कोई अपनी चिंता, न फिक्र, बस जीती है दूसरों के लिए हर पल
कब तक दूसरों को बचाएंगी, कभी तो अपने लिए भी जी ले माँ

बाहर से दिखती है जितनी सख्त, अंदर से उतनी ही नरम ।
माँ तू है किस मिट्टी की, जो सहती है सारे गम ।।

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किताब का दावा, तमिल हिंदू थे जिसस!

हाल ही में हिन्दु विचारक विनायक दामोदर सावरकर के भाई द्वारा लिखी गई किताब में दावा किया गया है कि जिसस एक तमिल हिंदू थे। हांलाकि यह दावा 70 साल पहले की एक किताब में किया गया था, जिसको शुक्रवार को दोबारा लॉन्च किया गया है।

गणेश सावरकर की इस किताब 70 साल बाद मराठी में पब्लिश की गई है, जिसका नाम है ‘क्राइस्ट परिचय’।

ईसाई धर्म के लोगों ने इस किताब के दोबारा लॉन्च होने पर विरोध प्रदर्शन भी किया, लेकिऩ इसके बावजूद भी इसे लॉन्च किया गया।

1946 में पहली बार इसे पब्लिश किया गया था, जिसमें दावा किया गया था कि जिसस का असली नाम केशव कृष्ण था। एस्सेन संगठन के लोगों ने जिसस को हिमालय की जड़ी-बूटियों से बचाया गया था। बाद में उन्होंने कश्मीर में समाधि ली थी। यहीं नही इस किताब में यह भी दावा किया गया है कि 12 साल की उम्र में जिसस का जनेऊ भी किया गया था।

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