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साहित्य और कविताएँ

माँ तू है किस मिट्टी की…

बाहर से दिखती है जितनी सख्त,अंदर से उतनी ही नरम
माँ तू है किस मिट्टी की, जो सहती है सारे गम ॥

सहती है सारे गम,फिर भी चुप रहती है
चुप रहती है, फिर भी करती है सबके काम अधूरे

करती है काम अधूरे सबके, कभी इसका, तो कभी उसका
कब तक दूसरों की परेशानियों को अपना बनाएगी, कभी तो अपने लिए भी जी ले माँ

बाहर से दिखती है जितनी सख्त, अंदर से उतनी ही नरम।
माँ तू है किस मिट्टी की,जो सहती है सारे गम ।।

घर में आफत आती है तो, ढाल बन कर खड़ी हो जाती है
ढाल बन कर बचाती है सबको, खुद पर आँच चाहे आ जाये

न कोई अपनी चिंता, न फिक्र, बस जीती है दूसरों के लिए हर पल
कब तक दूसरों को बचाएंगी, कभी तो अपने लिए भी जी ले माँ

बाहर से दिखती है जितनी सख्त, अंदर से उतनी ही नरम ।
माँ तू है किस मिट्टी की, जो सहती है सारे गम ।।

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