क्या हम अपने मोबाइल फ़ोन का सही प्रयोग कर रहे हैं?


“मोबाइलफ़ोन” : वरदान या अभिशाप


मोबाइल फ़ोन को अभिशाप कहना तो पूर्णत: अनुचित होगा क्योंकि ये अपने साथ क्रांति लाए। इन्होंने मनुष्य का दैनिक जीवन इतना सरल के दिया की इसकी कल्पना कभी मनुष्य ने अपने स्वप्न में भी नही की होगी। किसने सोचा था की हम कभी केवल एक टच से पूरी दुनिया की जानकारी ले पाएँगे, किसने सोचा था की इतने जटिल दिखने वाले गणित के सवाल भी चुटकी बजाते ही हल हो जाएँगे, किसने सोचा था की हम दूर बैठे रिश्तेदारों से इतनी आसानी से जुड़ पाएँगे।

लेकिन हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। हर किसी वस्तु के नकारात्मक पहलू भी ज़रूर होते हैं। ये हमारे जीवन को सरल बनाते हैं, यह हमें 24 घंटे इंटर्नेट से जुड़े रहने का मौक़ा देते हैं, आपको कही घूमने जाने के लिए एक अलग से कैमरा नही ले के जाना पड़ता क्योंकि इसमें ही यह सुविधा उपलब्ध होती है लेकिन देखा जाए तो स्मार्ट्फ़ोन एक बुरी आदत की तरह भी हैं क्योंकि यह मनुष्य को अपने ऊपर पूरी तरह निर्भर कर देते हैं।

मोबाइल फ़ोन
मोबाइल फ़ोन

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अब लोगों को एक अलग तरह का भय होने लगा है जिसे नोमोफ़ोबीया कहा जाता है। इसका अर्थ होता है अपने फ़ोन से दूर रहने का भय। इससे यह पता लगाया जा सकता है की आजकल के लोग अपने मोबाइल को अपना एक अंग बना चुके हैं जो यदि उनसे दूर कर दिया जाए तो उन्हें लाचार महसूस होने लगता है।

ज़रूरी प्रश्न जो है वह यह है की क्या मोबाइल फ़ोन का यही प्रयोग उचित है? क्या इन्हें इसीलिए बनाया गया था? अब लोग कमरे मेल बंद रहकर मोबाइल फ़ोन चलाना पैंज़ करते थे जहाँ हमारे देश में एक साथ बैठकर बात करना अच्छा माना जाता था। इससे माता पिता और बच्चों में दूरियाँ आनी शुरू हो जाती हैं क्योंकि बच्चों को मोबाइल चलाना पसंद करते हैं जबकि माता पिता चाहते हैं की बच्चे उनके साथ बैठकर बात करें जिससे उन लोगों में मतभेद होने शुरू हो जाते है।

ये फ़ोन ख़ुद तो स्मार्ट होते हैं लेकिन हमें स्मार्ट नही बनाते क्योंकि इन पर निर्भर होना हमें स्मार्ट कभी नही बना सकते। इनसे हम अपने मस्तिष्क का प्रयोग करना कम के देते हैं क्योंकि हमें उसकी कोई ख़ास ज़रूरत नही पड़ती। जो आने वाली पीढ़ियाँ होंगी उनके पास अपने बचपन की ऐसी यादें नही होंगी जो शायद हमारे और हमारे माता पिता के पास हैं। क्योंकि उनका बचपन में ही परिचय स्मार्ट्फ़ोन से हो चुका होगा। यह सच है की सेल्फ़ोन हमें जोड़े रखते हैं किंतु ये हमें अपने परिवार के लोगों से दूर के देता है।

इसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनो प्रभाव है। यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम ख़ुद को इसका कितना आदी बनाते हैं। यदि हम इसका सदुपयोग करेंगे तो यह अच्छा है अगर नही करेंगे तो यह केवल हमारा समय बेकार करेगा।

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Story By : AvatarKajal Sumal
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